मैं कायनात में, सय्यारों में भटकता था
धुएँ में धुल में उलझी हुई किरण की तरह
मैं इस ज़मी पे भटकता रहा हूँ सदियों तक
गिरा है वक़्त से कट के जो लम्हा,उसकी तरह
वतन मिला तो गली के लिए भटकता रहा
गली में घर का निशाँ ढुँढता रहा बरसो
तुम्हारी रूह में, अब जिस्म में, भटकता हूँ
लबो से चूम लो आँखों से थाम लो मुझको
तुम्हीं से जनमुँ तो शायद मुझे पनाह मिले
#गुलज़ार साहब
#आस्था