शीर्षक — तुम्हारी आँखों में बेचैनी
मैं लिखता हूँ तेरी कहानी,
दुनिया में तेरी प्रीत बताने के प्रति।
थोड़ा नादान हूँ, थोड़ा-सा पागल हूँ,
तुझसे इश्क़ जताने के प्रति...
तू भी मुझसे कम नहीं,
तेरी भोली-सी सूरत में खंजर छुपाकर रखती हो।
मेरे सीने पर वार कर, यूँ ही शब्दों में उतरती हो।
मैं शब्दों को सँवारने वाला,
तुम्हारे दिल को महकाने वाला।
चुन-चुनकर तुम्हारी
नादानी-नटखटपन सबको शब्दों में उतारता हूँ...
तुम्हारी आँखों का गुस्सा,
चेहरे की उदासी,
सब यूँ ही बयाँ कर देती हो।
मैं तो पागल ही हूँ,
जो तुम्हारी उदासी और गुस्से को
शब्दों में भी रंग भर देता हूँ...
तुम्हारे नखरे भी बहुत हैं,
मेरे शब्द बेरंग बताने की बात करती हो।
मेरे शब्दों में ख़ुद को ढूँढ़ती फिरती हो...
दूसरों की थोड़ी-सी संदेह तुम्हें मिलती,
तुम यूँ ही चिढ़ जाती हो...
जब तुम गुस्से में मुझे देखती हो,
सच बताऊँ, तुम चुड़ैल-सी लगती हो।
तुम्हारे शब्द, तुम्हारा चेहरा,
हर चिड़चिड़ापन तुम्हारा
मेरे प्रति प्रीत ही बयाँ करते हैं...
— एस.टी.डी. मौर्य ✍️