हम अपने जख्म दिखायेगे नहीं
जुबाँ दबा कर रखेगें शोर मचायेगें नहीं
उठा के सर चल रहा हूँ ऐं मेरे खुदा
गर झुका सर सजदे में तो फिर उठायेगें नहीं
मत रुला खुद को ऐ मेरे सनम
वरना हम भी कभी मुस्करायेगे नहीं
गिरें थे बहुत दरख्त कल के तुफान में
मर गये जो परिंदें, गिनायेगे नहीं
बहा ले गया सैलाब जाने कितनो के घर
अब कभी दरिया को देख जी बहलायेगे नहीं
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