जब-जब शहर की इस भीड़ में कोई अपना सा चेहरा दिखता है,
सच कहूँ, दिल का हर एक जख्म और ज्यादा गहरा दिखता है।
तुम्हारी यादों का यह समंदर जो रात को उमड़ता है,
बिस्तर की सिलवटों में हर पल तुम्हारा साया दिखता है।
वो तुम्हारे हाथों की गर्माहट, वो कंधे पर सर रखना,
वो हल्की सी डाँट पर मेरा मुस्कुरा कर चुप रहना...
सब कुछ कैद है इस दिल के किसी कोने में आज भी,
बस तुम नहीं हो पास, बाकी हर मंज़र अधूरा दिखता है।
तड़प यह नहीं कि तुम दूर हो, शिकवा तक़दीर से नहीं है,
दर्द यह है कि इस रूह को अब जीने की कोई वजह नहीं है।
तुम तो अपनी दुनिया में खुश होगे, नई बहारों के संग,
और यहाँ मेरा हर एक दिन सिर्फ तुम्हारी याद में ढलता है।