"खामोशी का साया"
कमरे के एक कोने में,
धुंधली सी एक परछाई है।
घड़ी की हर एक टिक-टिक में,
बस गहरी एक तन्हाई है।
ठंडी होती चाय की प्याली,
खिड़की पर बैठा एक परिंदा।
कुछ खामोश से पन्ने दिल के,
पूछ रहे हैं, "क्या तू है जिंदा?"
न कोई चीख, न कोई आँसू,
बस एक भारी सा सन्नाटा है।
वक्त की बहती धारा ने भी,
किनारा अपना कहीं बाँटा है।
- Ritu kumari