सिगरेट के अंगारों से लगाकर,
उड़ाते जो चले जाते हो।
क्या कभी यह सोचा है,
जीवन धुआँ तो नहीं।
तुम्हारे संग जुड़े हैं कुछ जीवन,
जल उठेंगे हृदय से,
सिगरेट की सुलगन से।
क्या कभी यह सोचा है,
रिश्ते धुआँ तो नहीं।
सड़क के किनारे खड़े होकर फूँको,
या वातानुकूलित दफ़्तर में,
खुलेआम सुलगाओ,
या चोरी-छुपे कमरे में।
क्या कभी यह सोचा है,
कलेजा धुआँ तो नहीं।
गर अब भी न सम्भलोगे,
तो विनाश को गले लगाओगे।
क्या कभी यह सोचा है,
उस क्षण तुम भी रह जाओगे बनकर
मात्र धुआँ ॥
~ श्री कृति