समय का चक्र
वृद्धाश्रम और अनाथालय...
कई बार
एक जैसे ही लगते हैं।
रिश्तों की आज़माइश में
एक जगह
सुनहरा बचपन छूट जाता है,
तो दूसरी जगह
बुढ़ापे का सुकून।
एक ओर
बच्चे परिस्थितियों और मजबूरियों के बीच
अपनों से दूर हो जाते हैं,
तो कहीं
बुज़ुर्ग अपने ही लोगों से
विचारों के फ़ासलों में खो जाते हैं।
समय भी कितना विचित्र है...
जो हाथ कभी
एक नन्ही उँगली थामकर चलना सिखाते थे,
आज वही हाथ
किसी सहारे की प्रतीक्षा करते हैं।
और जो बच्चे
कभी किसी अपने की तलाश में थे,
वे भी सिर्फ़
एक अपनापन चाहते हैं।
सोचती हूँ...
रिश्ते अगर प्रेम से निभाए जाएँ,
तो शायद
न कोई अनाथ कहलाए,
न कोई अपने होते हुए भी
अकेला रह जाए।
क्योंकि...
समय का चक्र
यही सिखाता है—
आज जिसे हमारी ज़रूरत है,
कल हमें उसकी ज़रूरत होगी।