Hindi Quote in Poem by Navneet Kaur

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सुनो...
हाँ, तुम समाज हो न?
मुझे हर कदम पर जज करना छोड़ दो।
मैं तुम्हारी बनाई हुई परिभाषाओं में फिट नहीं बैठती।

और तुम संस्कार,
संस्कारों का घूँघट ओढ़कर
बहुरूपिया मत बनो।
मुझे घूँघट का अर्थ मत सिखाओ।

और तुम परंपरा,
जो पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही हो,
तुम यह मत बताओ
कि मुझे कैसे चलना है।

और तुम... परिवार।
जहाँ अपनापन होना चाहिए,
जहाँ यह एहसास हो
कि पूरी दुनिया ठुकरा दे,
तो भी मैं यहीं सुरक्षित रहूँगी।

पर तुम्हें क्या हो गया?
तुम भी बँटने लगे,
अपना-पराया,
नफ़ा-नुकसान देखने लगे।
अब तुम भी जाओ।

लेकिन...
लौटकर आना तो ज़रूर।
तुम सब—समाज, संस्कार, परंपरा और परिवार।
बस छोड़ आना
अतीत की धूल,
विरासत में मिली नफ़रतें,
और बंद ताले-चाबियाँ।

साथ ले आना
प्यार, सम्मान
और कुछ ताज़े फूल।

तब मैं यहीं मिलूँगी,
आरती का थाल लिए।

लेकिन यदि फिर वही खोखले रीति-रिवाज़ लेकर आए,
तो यहाँ तुम्हें
एक खाली खंडहर के सिवा कुछ नहीं मिलेगा।

✍️ नवनीत कौर

Hindi Poem by Navneet Kaur : 112032467
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