मैं घर की बड़ी बेटी हूँ,
और शायद परफेक्ट भी नहीं हूँ...
बस वक़्त ने मुझे परफेक्ट बनना सिखा दिया।
कभी ज़िम्मेदारियों का बोझ उठाकर,
कभी अपनी ख्वाहिशों को चुप कराकर,
मैं हर दिन थोड़ा-थोड़ा बड़ी होती गई।
दिल तो मेरा भी करता था
बेख़ौफ़ होकर जीने का,
कुछ गलतियाँ करने का,
कुछ ज़िदें पूरी करने का...
मगर हर बार एक आवाज़ आई—
"लोग क्या कहेंगे?"
"घर की इज़्ज़त का ख़याल रखो।"
"तुम बड़ी हो, तुम्हें समझदारी दिखानी चाहिए।"
"छोटे तुमसे सीखेंगे..."
और फिर मैंने अपने दिल को ही समझा लिया।
धीरे-धीरे ऐसा हुआ कि
सबकी फ़िक्र करते-करते
मैं ख़ुद को ही भूल गई।
सबकी पसंद याद रही,
मगर अपनी पसंद क्या है,
ये याद रखने की फ़ुर्सत ही नहीं मिली।
सबके सपनों के लिए दुआएँ माँगी,
मगर अपने सपनों को
अक्सर तकिए में छुपाकर सुला दिया।
क्योंकि बड़ी बेटियाँ अक्सर
अपनी उम्र से पहले बड़ी हो जाती हैं...
वो रोती भी हैं,
टूटती भी हैं,
थकती भी हैं...
मगर फिर भी मुस्कुरा देती हैं,
ताकि घर वालों को लगे कि
सब ठीक है।
❤️रूहानिका बंसल❤️
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क्या आप भी घर के बड़े बेटे या बड़ी बेटी हैं? अगर हाँ, तो इस एहसास को ज़रूर महसूस करेंगे... 🥀
एक नई शुरुआत… ✨
अपनी पहली पोस्ट आप सभी के साथ साझा कर रही हूँ।
उम्मीद है मेरी इस छोटी-सी कोशिश को आपका प्यार और साथ जरूर मिलेगा। ❤️
आपका साथ मेरे लिए बहुत मायने रखता है। 🥰”