अश्क आंखों से बरसते रहे
तमाम उम्र इक मुस्कुराहट को तरसते रहे
पतझड़ ने साख पे जब से ली है पनाह
पत्ते रास्तों पे भटकते मिलें
आंधियों से जो न घबराये कभी
मेरी टूटती हर सांसें पे बुझते गये
नजर के तीर पे बस निकला है दम
जुबाँ की चोट पे सदियों तलक बिखरते रहे
वो पत्थर हो चुका अब मेरे लिए
जिसे अपने सीने का दिल हम समझते रहे