The Silent Sea
वह अक्सर चुप रहता है महफ़िल में अपनी,
क्योंकि उसके शोर का कोई घर नहीं होता।
हज़ार सवाल लेकर भटकता है दर-ब-दर,
पर हर सवाल का जवाब उसकी ज़ुबाँ पर नहीं होता।
उसका छुपा हुआ दर्द
मुस्कुरा देता है वो अक्सर ज़माने के सामने,
ताकि उसकी थकावट का किसी को अंदाज़ा न हो।
टूटता है वो अंदर ही अंदर हर एक रोज़,
पर बाहर उसकी दरारों का कोई दरवाज़ा न हो।
दुनिया कहती है उससे— "कुछ बनकर दिखाओ,"
पर कोई यह नहीं देखता कि वो हर रात खुद से ही हारता है।
उसकी जेब से ज़्यादा उसका आत्मसम्मान खाली है,
वो बस अपनी उम्मीदों के बोझ को ही हर पल संवारता है।
मोहब्बत और डर का साया
उसे डर मोहब्बत के खो जाने का नहीं,
बल्कि उस मोहब्बत के 'लायक' न होने का होता है।
जिस हाथ ने थामा था उसे बड़े नाज़ से,
वो उसी हाथ पर एक दिन 'बोझ' बनने से डरता है।
इसीलिए वो खुद ही चुपके से दूर जाने लगता है,
वो हिसाब नहीं करता, बस खुद को एक 'कर्ज़' समझ बैठता है।
"मर्द हो... मज़बूत बनो"
कौन समझेगा उस लड़के के भीतर के समंदर को,
जो खुलकर रोना भी आज तक सीख नहीं पाया।
बचपन से ही घुट्टी में पिलाया गया था उसे—
"तुम मर्द हो... तुम्हें कभी कमज़ोर नहीं होना।"
आख़िरी पैगाम -
तो उसकी इस ख़ामोशी को तुम कभी उसकी बेरुख़ी मत समझना,
क्योंकि सबसे ज़्यादा शोर अक्सर उसी दिल में होता है जो सबसे कम बोलता है।
कुछ लड़के ज़िंदगी की बाज़ी में हारना नहीं चाहते,
वो तो बस तन्हाई के इस सफ़र में इतना चाहते हैं...
कि कोई आए, हाथ थामे, और धीरे से पूछे—
"सुनो, तुम सच में कैसे हो?"