ये कैसी उलझन है,
मन में ख़ामोशी है,
पर लबों से शोर बहता है।
इक झरने-सा भटक रहा हूँ,
राह कोई मिल नहीं रही,
फिर भी समंदर की प्यास बुझाने को आतुर हूँ।
मानो उन लहरों से अठखेलियाँ करना चाहता हूँ,
जहाँ मेरा बचपन घूमता था।
शायद अब यही अंत है..!
- Manvika Shveta