दित में दर्द आबाद रहा अब तक
तुम्हें क्या मालुम कितना उदास रहा अब तक
इन रास्तों को मालुम है, हमपे जो गुजरी
पाँव में इक खार लिए चलता रहा अब तक
होंठ सीं चुका हूँ और क्या करता
मेरे बोलने पर बवाल रहा अब तक
नब्ज टटोली अपनी, तो ये मालुम हुआ
कुबूल न हुई मेरी, दुआ अब तक