कुण्डलिया छंद ४
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ज्ञानी मुझको मानना, कहाँ बड़ा अपराध।
सबको ये अधिकार है, मन चाहा ले साध।।
मन चाहा ले साध, फ़र्क कब मुझको पड़ता।
कब आकर के द्वार, आपके हूँ मैं लड़ता।।
कहें मित्र यमराज, करो जमकर मनमानी।
धन्यवाद आभार, मानते रहना ज्ञानी।।३६
मोहित मत हो जाइए, सुनकर सबके गीत।
नहीं भरोसा आजकल, कौन शत्रु या मीत।।
कौन शत्रु या मीत, समझना बहुत जरूरी।
भले रहें वो दूर, आपकी भी मजबूरी।।
कहें मित्र यमराज, लगे कितना भी सोहित।
सोच समझकर यार, आपको होना मोहित।।३७
नारी का भी आजकल, बदल रहा है रंग।
जिसे देख वो आप ही, होती रहती दंग।।
होती रहती दंग, जमाना क्यों है दोषी।
जब अपने ही हाथ, आप को पाली पोषी।।
कहें मित्र यमराज, पड़ेगा इक दिन भारी।
गारी भी अब आज, खूब देती है नारी।।३८
नारी अब कहती नहीं, चुप थी जो इक बार।
यही आज के सत्य का, बना हुआ आधार।।
बना हुआ आधार, दोष क्यों दें हम उनको।
दोषी को सब जान, नहीं कुछ कहते जिनको।।
कहें मित्र यमराज, समस्या इतनी सारी।
लेते पल्ला झाड़, मानकर दोषी नारी।।३९
नारी निज अपमान से, होती विचलित नित्य।
समझ नहीं आता उसे, इसका जो औचित्य।।
इसका जो औचित्य, जमाना बढ़ता आगे।
पर नारी सम्मान, नाम आखिर क्यों भागे।
कहें मित्र यमराज, बड़ी भारी लाचारी।
इसीलिए तो आज, नित्य रोती है नारी।।४०
अंबर क्यों सूना लगे, बड़ा प्रश्न है आज।
या फिर कोई खास है, इसके पीछे राज।।
इसके पीछे राज, हमें कोई समझाए।
जिस कारण से आज, लगे जैसे मुरझाए।
कहें मित्र यमराज, शांत भी दिखे समंदर।
या देता है साथ, प्रेम में भीगा अंबर।।४१
सोना महँगा हो गया, जन मानस बेचैन।
मंहगाई डायन बनी, भीगे सबके नैन।।
भीगे सबके नैन, चमक का हर दिन मेला।
सबका अपना भाग्य, ईश भी खेले खेला।।
कहें मित्र यमराज, नहीं ये जादू टोना।
चच्चा ट्रंप विलेन, हुआ जो महँगा सोना।४२
जीवन जीने के लिए, करते रहिए काम।
तभी मिलेगा आपको, नूतनता आयाम।।
नूतनता आयाम, खुशी तब होगी भारी।
चिंता होगी दूर, आपकी जब तैयारी।।
कहें मित्र यमराज, लगे सुख का सब सीजन।
खुशियों की बरसात, महकता लागे जीवन।।४३
माना सबका एक सा, समय नहीं दे साथ।
दोषी किसको हम कहें, क्या है अपने हाथ।।
क्या है अपने हाथ, भूलकर हमको बढ़ना।
समय मिला जो आज, उसे है प्यारे गढ़ना।।
कहें मित्र यमराज, यही हम सबने जाना।
दुनियाँ की हर बात, धैर्य रखकर भी माना।।४४
जीवन गुंजित था कभी, सूने पड़े मुँडेर।
पक्षी अब आते नहीं, भूले अपनी टेर।।
भूले अपनी टेर, गया मिट मीठा कलरव।
कल तक था जो सत्य, आज अब लगे असंभव।।
कहें मित्र यमराज, बचेगा क्या अब निम्मन।
कहाँ सुनेंगे आज, शोर अब मधुरिम जीवन।।४५
आया अब ऐसा समय, भारत दे आदेश।
प्रेम प्यार से सब रहो, नाहक करते क्लेश।।
नाहक करते क्लेश, समझ में क्यों नहिं आता।
अच्छा नहीं घमंड, बने हो सबके दाता।।
कहें मित्र यमराज, समझ ले तू भी भाया।
विश्व पटल पर आज, देश भारत अब आया।।४६
भारत दे आदेश अब, सुनता है संसार।
स्वाभिमान सबका रहे, यही आज का सार।।
यही आज का सार, व्यर्थ आपस में लड़ना।
होगा जो नुकसान, सभी को कल में भरना।।
कहें मित्र यमराज, बने मत आप बुझारत।
सीखो आकर आप, सिखाता मेरा भारत।।४७
गायब लोक लिहाज सब, मर्यादा बेशर्म।
कलयुग के इस दौर में, कैसा मानव धर्म।।
कैसा मानव धर्म, ईश ये किसकी माया।
या फिर है संकेत, अँधेरे की अब छाया।।
कहें मित्र यमराज, बनें हम सब क्यों साहब।
दीन धर्म ईमान, सभी कुछ होता गायब।।४८
होता जीवन में कभी, नाहक मिले कलंक।
नहीं पता है किसी को, कौन मार दे डंक।।
कौन मार दे डंक, बड़ी चिंता तब होगी।
बिना किसी इलाज, मरे बेचारा रोगी।।
बिना किसी अपराध, धर्म ईमान है रोता।।
कहें मित्र यमराज, चाह से सब कब होता।।४९
चाहत हो जन-मन सभी, सबका हो कल्याण।
निंदा नफ़रत से सदा, मुक्त भावना त्राण।।
मुक्त भावना त्राण, जगत खुशहाली होगी।
दुनिया में तब आज, नहीं कोई मन रोगी।।
कहें मित्र यमराज, कौन तब होगा आहत।
यदि हो जाए उच्च, आज हर जन की चाहत।।५०
सुधीर श्रीवास्तव