Hindi Quote in Poem by Sudhir Srivastava

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कुण्डलिया छंद
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कैसा इनका हाल, आप हम सब ही जानें।
बात अलग है और, नहीं सरकारें मानें।।
नहीं सरकारें मानें, राम कहानी इनकी।
भरते सबका पेट, सोच उच्च है जिनकी।।
कहें मित्र यमराज, चलेगा कब तक ऐसा।
इनका भी परिवार, कटेगा जीवन कैसा।।२४

केवल सकता देख है, दिवास्वप्न वो रोज।
पर जीवन में सत्य की, करते रहना खोज।।
करते रहना खोज, यही मजदूर कहानी।
जिसे सुनाकर सो गए, पुराने पुरखे जानी।।
कहें मित्र यमराज, काम करना है भर बल।
बस इतना ही हाथ, सदा उसके है केवल।।२५

आँसू पीकर रह गया, था इतना मजबूर।
जितना लगता पास थे, समझ गया हूँ दूर।।
अब समझा हैं दूर, समय की है सब लीला।
चाहे जैसा रंग हो, हमें तो दिखता नीला।
कहें मित्र यमराज, दौर आया है बासू।
मूरख हो क्या आप, बहाते इतना आँसू।।२६

मुझको मूरख मानकर, रहिए आप प्रसन्न।
और निकट आ जाइए, संकट के आसन्न।।
संकट के आसन्न, आपका चिंतन भारी।
या फिर आया दौर, नयी आई बीमारी।
कहें मित्र यमराज, समझ इतनी है तुझको।
इसीलिए तो यार, समझता मूरख मुझको।।२७

मानव मन को खोखला, करता दीमक खूब।
तभी दीखता इन दिनों, कुंठा में सब डूब।।
कुंठा में सब डूब, बढ़ी है ये बीमारी।
इसीलिए तो बढ़ रही, आज भारी दुश्वारी।।
कहें मित्र यमराज, यार सब बचकर रहना।
वरना मानो आप, सभी को निश्चित ढहना।।२८

जिसकी जैसी सोच है, वैसा उसका काम।
होता भी तो नाम है, या फिर हो बदनाम।।
या फिर हो बदनाम, किसे अब होती चिंता।
मान रहे हैं लोग, व्यर्थ क्यों करना छिंता।।
कहें मित्र यमराज, फ़िक्र है किसको किसकी।
सभी सोचते आज, सोच होती जस जिसकी।।२९

अपने मन पर आपका, हो इतना अधिकार।
जो खुद को भी प्रेम से, हरदम हो स्वीकार।।
हरदम हो स्वीकार, यही हो कोशिश सबकी।
नहीं बीच की राह, खोजकर कहना तब की।।
कहें मित्र यमराज, व्यर्थ ना जाएँ सपने।
नहीं दीजिए दोष, रखें मन काबू अपने।।३०

तिनका सा संसार है, भला समझता कौन।
फिर भी हर पल भौंकते, रह पाते कब मौन।।
रह पाते कब मौन, यही तो पीड़ा भारी।
फैली जस है आज, धरा कोरोना बीमारी।।
कहें मित्र यमराज, बताओ दोष है किसका।
मातु सिया तो याद, हाथ जिनके था तिनका।।३१

फैला जो आतंक है, समझ न आये आज।
मगर सभी हमज्ञ जानते, इसके पीछे राज।।
इसके पीछे राज, भोगते हम सब सारे।
पर कुछ लोगों के आज, चमकते भाग्य सितारे।।
कहें मित्र यमराज, मिटेगा कब ये मैला।
चिंतित हैं सब लोग, गर्भ किस माँ के फैला।।३१

गाते हम आतंक का, नित्य बेसुरा राग। अच्छे से सब जानते, कैसे जन्मा नाग।। जन्मा है जो नाग, चलो हम इसको कुचलें। जाति-धर्म को भूल, राह हम मिलकर चल लें।।
कहें मित्र यमराज, व्यर्थ की छोड़ो बातें।
कोई श्रेष्ठ उपाय, एक स्वर में हम गाते।।३२

नाहक ही सब चाहते, मिले मान सम्मान।
इसके पीछे मात्र है, छिपा हुआ अभिमान।।
छिपा हुआ अभिमान, पड़ेगा कल को भारी।
फल की चिंता छोड़, करो अपनी तैयारी।।
कहें मित्र यमराज, व्यर्थ है बनना ग्राहक।
करो नहीं तकरार, कर्म बिन सब है नाहक।।३३

आओ मिलकर हम करें, ऐसा आज उपाय।
जिससे हो आतंक का, बंद सदा अध्याय।।
बंद सदा अध्याय, बहुत अब खेल हो चुका।
कब तक इसके साथ, चलेगा ये छिपी-लुका।।
कहें मित्र यमराज, एकता भाव दिखाओ।
छोड़-छाड़ तकरार, संग सब आगे आओ।।३४

नेता जी फिर कह रहे, नहीं सहेंगे और।
अब बनने देंगें नहीं, आतंकी सिरमौर।।
आतंकी सिरमौर, राष्ट्र है सबसे पहले।
करें सभी मिल काम, चलेंगे नहले-दहले।।
कहें मित्र यमराज, चलो कोई तो चेता।
काश बात पर यार, टिका रह पाए नेता।।३५

सुधीर श्रीवास्त

Hindi Poem by Sudhir Srivastava : 112024913
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