मैं और मेरे अह्सास
माँ
नामाबर को आने में देर हो गई l
चैन ओ सुकून की घड़ी खो गई ll
माँ ने चिट्ठी भेजी बेटा कब आएगा l
फ़िर से सुलगते सवाल को बो गई ll
राह तकती हुई दरवाज़े पर खड़ी l
इंतजार करते करते वही सो गई ll
दीदार की तमन्ना औ आशाभरी l
एक और शाम ही यूहीं लो गई ll
मन बना लिया न मिलने का तो l
बुलाने पर न आया माँ रो गई ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह