मैं और मेरे अह्सास
निगाहें
निगाहों से निगाहें मिलाने निकले हैं l
ये क्या गुनाह करने जाने निकले हैं ll
लगता है समझना ही फुजूल है कि l
बेवफा को अपना बनाने निकले हैं ll
अपनेआप को बूत बना दिया है कि l
पत्थर दिल को पिघलाने निकले हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह