दोहा - तारतम्य
तारतम्य ही सूत्र है, हर रिश्ते का सार।
इसके बिन चलता भला, कब लंबा व्यवहार।।
मन वाणी के साथ ही, मधुरिम जीवन सार।
तारतम्य संभावना, देती नव आधार।।
तारतम्य से जोड़ना, हमें आपसी प्यार।
रिश्तो में हो मधुरता, सुंदरतम संसार।।
तारतम्य का टूटना, देता गहरा घाव।
जीवन भर अफसोस हो, इसका यही प्रभाव।।
तारतम्य का देखिए, सेना में विस्तार।
नीति नियम से दे रहे, जिसका जो अधिकार।।
आज किसे परवाह है, व्यक्ति हो या परिवार।
सभी दंभ में तोड़ते, तारतम्य का तार।।
इतने भी अभिमान में, रहें नहीं हम आप।
तारतम्य से दूर हो, करना है क्या पाप।।
सुधीर श्रीवास्तव