मेरा घर कहाँ है?
मायके की देहरी ने धीमे से कहा—
“बिटिया, अब तू पराई हो गई।”
ससुराल की चौखट ने भौंहें चढ़ाकर पूछा—
“तू इतना इठलाती ये तेरा घर है क्या?”
दो आँगनों के बीच झूलती रही मैं,
जैसे प्रश्न कोई, जिसका उत्तर किसी के पास नहीं।
एक ने जन्म दिया, पर अधिकार सीमित कर दिया,
दूसरे ने अधिकार माँगा, पर अपनापन तौलता रहा।
पर अब मैं पूछती नहीं—घोषणा करती हूँ,
मैं स्वयं अपनी देहरी, स्वयं अपना आकाश हूँ।
नारी हूँ—कमज़ोर नहीं, संकल्प की ज्योति हूँ,
अब मैं खामोश नहीं—तीव्र स्वर बन चुकी हूँ,
अब किसी देहरी की मोहताज नहीं रही।
मैं नारी हूँ—अपना घर खुद रच लेने वाली,
जहाँ कदम टिक जाएँ मेरे—वही संसार बना देती हूँ।
अब मुझसे मत पूछो—“तेरा घर कहाँ है?”
मैं जहाँ खड़ी हो जाऊँ—वहीं घर खड़ा कर देती हूँ।
किंतु अब मौन मेरा विवशता नहीं—संकल्प बन चुका है,
अश्रु नहीं, अब नेत्रों में तेज का प्रकाश है।
मैं आज की नारी हूँ—अदम्य साहस की प्रतिमूर्ति,
प्रचंड तूफानों में भी अपनी नौका पार लगा सकती हूँ।
जिसे तुम पराया कहते रहे युगों से—
वही आज स्वयं अपना संसार रच सकती हूँ।
उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’