भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी के शासन काल में राजस्थान के राजघरानों से निकाले गए खजानों का क्या हुआ? क्या उसे देशहित में प्रयोग किया गया है?
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यदि कोई देश ऐसी वस्तुएं नहीं बना पा रहा है जिन्हें निर्यात करके डॉलर कमाए जा सके तो व्यापार घाटा होने लगता है। और डॉलर ख़त्म होने के बाद यदि कोई भी देश डॉलर देने को तैयार न हो तो सिर्फ सोना ही देश को बचा सकता है।
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1969 में भारत पर पहली बार बड़ा डॉलर संकट आया था, तब सोने के कारोबार / आयात पर कई तरह के प्रतिबन्ध रोक लगा कर डॉलर की निकासी कम करने के प्रयास किये गए (जो कि एक गलत फैसला था) । 1974 के परमाणु परिक्षण के कारण अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों ने भारत पर कई तरह के आर्थिक प्रतिबन्ध लगा दिए, अत: 1976 में डॉलर फिर से ख़त्म हो गए।
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इंदिरा जी के पास तब 4 रास्ते थे :
परमाणु कार्यक्रम रोककर CTBT साइन करना, ताकि अमेरिका हमारे लिए डॉलर के रास्ते खोले। ( इस संधि को पोकरण के कारण ही ड्राफ्ट किया गया था )
मंदिरों को सरकारी नियंत्रण में लेकर मंदिरों से सोना उठाना ( उनके आर्थिक सलाहकारों ने उन्हें यही राय दी थी )
सोना इकट्ठा करने के अन्य विकल्पों पर विचार करना
निर्यात बढाने के लिए जूरी सिस्टम लागू करना
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जूरी सिस्टम तो उनको लाना नहीं था, अत: उन्होंने तीसरे रास्ते के तहत राजाओं का सोना उठाने की कोशिश की। आजादी के समय सभी रजवाड़ो ने अपनी संपत्तियो की घोषणा की थी, और इंदिरा जी संदेह था कि जयपुर राजघराने ने बहुत बड़ी मात्रा में खजाना छिपाया हुआ है। अत: उन्होंने आपातकाल के दौरान जयगढ़ पर छापा मारकर खजाने की तलाश शुरू की। छापे के समय राजपरिवार जेल में था। सेना द्वारा कई दिनो तक किले में सर्च ऑपरेशन चलाया गया। इस गोल्ड हंटिंग के 2 वर्जन मौजूद है :
ऑफिशियल वर्जन है, कि सरकार को वहां से कुछ नहीं मिला। सोने का एक सिक्का तक नहीं।
अटकलें लगाई जाती है कि खजाना मिल गया था, लेकिन इंदिरा जी ने इसे हड़प लिया।
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कुछ मानते है कि खजाना नहीं मिला और कुछ मानते है कि खजाना मिल गया था। अब यह अपना अपना अनुमान लगाने वाली बात है। जिसे जो वर्जन सूट करता है, वह वैसा दावा करता है। सबूत किसी भी पक्ष के पास कोई नहीं है।
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Indira Gandhi ordered a gold hunt in 1976; Pak sought share | India News - Times of India
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मेरा अनुमान है कि, सेना को खजाना नहीं मिला था। इस तरह के ऑपरेशन को इतने गुप्त रूप से नहीं चलाया जा सकता कि पीछे कोई भी सुराग नहीं रहे। पुरातत्व विभाग के अधिकारियों एवं सर्वेयरो को शामिल करते हुए लगभग 250 लोगो का स्टाफ था, जो यह खुदाई कर रहा था। यदि खजाना मिलता तो बात छुपती नहीं थी, और कोई न कोई संकेत सामने आ जाते। राजपरिवार ने भी तब से आज तक कभी भी सरकार पर यह आरोप नहीं बनाया कि उनका खजाना ले लिया गया। तब भी जब इंदिरा जी सत्ता गँवा चुकी थी, और जनता सरकार आने के बाद हत्या, अपहरण आदि जैसे मुकदमो का सामना कर रही थी।
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1990 में हम फिर से अटक गए और देश चलाने के लिए सिर्फ 2 हफ्ते का डॉलर बचा था। अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों ने पूरी फील्डिंग लगाकर रखी थी कि हमें कहीं से भी लोन न मिल पाए। यहाँ तक कि आईएम्ऍफ़ एवं विश्व बैंक ने हमें शोर्ट टर्म लोन देने से भी इंकार कर दिया। तब भारत में 46 टन सोना जहाज में भरकर बैंक ऑफ़ इंग्लेंड भेजा और बदले में डॉलर लिए। लेकिन यह देश चलाने के लिए काफी नहीं था।
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आईएम्ऍफ़ ने भारत के सामने शर्त रखी कि, यदि हम भारत का बाजार अमेरिकी-ब्रिटिश कंपनियों के लिए खोल देते है (WTO agreement) तो ही हमें डॉलर मिलेंगे वर्ना नहीं। इस समय स्थिति यह थी कि पैसा न होने के कारण चंद्रशेखर सरकार अपना बजट भी पेश नहीं कर पाई थी। अंत में भारत ने अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों की शर्तें मानी और हमने समझौते पर दस्तखत किये।
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बाजार खोलने के बाद भी भारत का व्यापार घाटा निरंतर बढ़ रहा है, किन्तु अब यह आपको इसीलिए नजर नहीं आता कि विदेशी निवेश की अनुमति देने के बाद सरकारें भारत की राष्ट्रिय संपत्तियां बेचकर देश चलाती रहती है। पिछले 30 वर्षो से वे लगातार इसी तरीके से देश चला रहे है। और इस तरह हम आज पहले से भी बदतर स्थिति में है।
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जब ये संपत्तियां ख़त्म हो जायेगी तो हमारे नेता अपना झोला (भरा हुआ) उठाकर निकल लेंगे। क्योंकि जब भी भारत की संपत्ति औने पौने दामो में बेचीं जाती है तो एक बड़ा हिस्सा हमारे नेताओं की जेब में जाता है !! कभी यह पेड मीडिया में सकारत्मक कवरेज के रूप में होता है कभी नकदी के रूप में।
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अभी अगले साल तक इन लोगो ने 2 लाख करोड़ का माल बेचने का टार्गेट बनाया है - 28 कंपनियों को बेच रही है मोदी सरकार, संसद में बेशर्मी से बोले मंत्री- घाटा हो या मुनाफ़ा हम तो बेचेंगे
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समाधान – रिक्त भूमि कर एवं जूरी कोर्ट का प्रस्तावित क़ानून गेजेट में आने से भारत में बड़े पैमाने पर निर्माण इकाइयां शुरू होने का रास्ता साफ़ हो जाएगा, और भारत ऐसी वस्तुएं बनाने लगेगा जिन्हें निर्यात करके डॉलर कमाए जा सके। जूरी कोर्ट एवं रिक्त भूमि कर लाये बिना निर्यात बढ़ाना संभव नहीं है।
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