सावली लड़की
एक सावली लड़की की माँ
कोसती है अपनी अंतरात्मा को,
अपने ही मैले रंग में रंगी
धूप से बनती सावली छाया को
मानती है अभिशाप
समाज के कुछ पुरुषों के लिए।
एक सावली लड़की का पिता
अकाल से ग्रसित किसान की भाँति
भागता है हर पल,
भोजन के बाद भी
धूप में हाथ नहीं सुखाता,
दौड़ता है युद्ध के अश्व बनकर
लड़की के भविष्य के पीछे।
उसे पता है—
सावलेपन की सही कीमत
दहेज में चुकानी होगी,
मेहमानों की खातिर में
अपनी हैसियत झोंकनी होगी।
लड़कियाँ सावली क्यों होती हैं—
सदियों से इस पर
कोई सवाल क्यों नहीं उठता?
हमेशा से सावली लड़की की
सिर्फ आलोचना ही हुई,
कभी किसी ने इनकी व्याख्या नहीं की।
क्या इतना ज़रूरी था
लड़कियों का सावला होना?
अगर सावला ही बनाना था,
तो हर लड़की को पुरुष बना देते—
पुरुषों के सावलेपन पर
कभी कोई तूफ़ान नहीं आता।
सावले से सावले पुरुष को भी
चाहिए होती है
एक उजली लड़की।
सावली लड़की देख नहीं सकती
सुंदर पुरुष के सपने,
उसे डर है—दुनिया हँसेगी
उसके सावलेपन पर।
कुछ अधूरे सपने
अक्सर सावली लड़कियों को
अंदर से तोड़ देते हैं।
लड़की सावली होकर भी
सावलेपन से घृणा करती है,
केवल पुरुष और उनके समाज के लिए।