मैं छोटी सी कविता
पलभर चली,
क्षणभर खिली
हर परिचय में मिली।
सुगन्ध सी फैली
धरा में मिली,
टूटे सपनों की धात्री
देशों में घुली मिली।
चेहरा दैदीप्यमान
साथी संग हँसी,
छुआ जब मन को
सिहर कर मुस्करायी।
मैं छोटी सी कविता
वसंत संग लौटी,
गरज के बरसी
क्षणभर में बिखर गयी।
पता बताने लौटी
खर-पतवार उखाड़,
प्रिय संग बैठी
नित नये रूप में खड़ी,
छोटी सी कविता हूँ।
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** महेश रौतेला