ॐ नमः शिवाय।
वेदों में प्रयुक्त काम शब्द या वासना केवल यौन इच्छाएँ नहीं हैं बल्कि इसमें सभी प्रकार के भौतिक सुख भी सम्मिलित हैं।
इस प्रकार वासना कई रूप दर्शाती है। जैसे:-
धन की इच्छा,
शारीरिक लालसाएँ,
प्रतिष्ठा की अभिलाषा,
सत्ता की भूख इत्यादि।
वासना केवल भगवान के प्रति प्रेम का विकृत प्रतिबिंब है जो कि प्रत्येक जीवित प्राणी का अंतर्निहित स्वभाव है।
जब आत्मा शरीर से संयुक्त होकर माया शक्ति के सम्पर्क में आती है तब तमोगुण के संयोग से इसका दिव्य प्रेम वासना में परिवर्तित हो जाता है।
दिव्य प्रेम भगवान की सर्वोच्च शक्ति है। अतः भौतिक क्षेत्र में इसका विकृत स्वरूप जो कि काम वासना है, वह भी अति प्रबल शक्ति है।
श्रीकृष्ण ने सांसारिक सुखों के भोग की लालसा को पाप के रूप में चिह्नित किया है क्योंकि यह प्रलोभन हमारे भीतर छिपा रहता है।
रजोगुण आत्मा को यह विश्वास दिलाता है कि सांसारिक विषय भोगों से ही तृप्ति प्राप्त होगी। इसलिए किसी भी मनुष्य में इन्हें प्राप्त करने की कामना उत्पन्न होती है।
जब कामना की पूर्ति होती है तब इससे लोभ उत्पन्न होता है और इसकी संतुष्टि न होने पर क्रोध उत्पन्न होता है।
कामना, लोभ और क्रोध इन तीनों विकारों से ग्रस्त होकर मनुष्य पाप करता है।
लोभ कामनाओं का प्राबल्य है जबकि क्रोध कुण्ठित इच्छा है। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने वासना या कामना को सभी बुराइयों की जड़ के रूप में चिह्नित किया है।
आपका अपना
आचार्य दीपक सिक्का
संस्थापक ग्रह चाल कंसल्टेंसी