मैं और मेरे अह्सास
बंजर भूमि
बाग की बंजर भूमि पर गुल खिला ने चला हूँ l
गुलशन की दुनिया में प्यार पिला ने चला हूँ ll
खूबसूरती हुस्न की आशिकों बहका रही है l
तिराडो की कायनात को हिला ने चला हूँ ll
प्यार की नदियों की जल धारा को बहाकर l
प्यासी भूमि की प्यास को बुझा ने चला हूँ ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह