ठहराव की छाया
कभी-कभी
दुनिया बहुत तेज़ भागती है,
जैसे किसी अदृश्य मेले में
सबको जल्दी पहुँचना हो।
सड़कें थक जाती हैं,
पैर धूल से भर जाते हैं,
पर लोग फिर भी चलते रहते हैं—
मानो रुकना कोई भूल हो।
ऐसे ही एक मोड़ पर
एक बूढ़ा पेड़ खड़ा है।
वह किसी से कुछ नहीं कहता,
बस छाया बिखेरता रहता है।
जो भी थोड़ी देर रुकता है,
उसे हवा धीरे से समझाती है—
कि सफ़र केवल चलना नहीं होता,
कभी-कभी ठहरना भी रास्ता होता है।
और तब लगता है
कि जीवन कोई दौड़ नहीं,
बल्कि एक लंबी पगडंडी है
जहाँ हर कदम के साथ
मन भी थोड़ा-सा घर लौटता है।