ऋगुवेद सूक्ति- (३०) की व्याख्या यह मन्त्र ऋग्वेद (मण्डल 7, सूक्त 32, मन्त्र 14) है। यह सूक्त मुख्यतः इन्द्र की स्तुति में है।
मन्त्र--
कस्तमिन्द्र त्वावसुमा मर्त्यो दधर्षति।
(ऋग्वेद 7.32.14)
भावार्थ --आपके भक्त का कोई तिरस्कार नहीं कर सकता
पदच्छेद--
कः । तम् । इन्द्र । त्वा-अवसुमान् । मर्त्यः । दधर्षति ॥
शब्दार्थ--
कः — कौन
तम् — उस (मनुष्य को)
इन्द्र — हे इन्द्र
त्वा-अवसुमान् — जो तेरी सहायता/अनुग्रह से सम्पन्न है
मर्त्यः — मनुष्य
दधर्षति — दबा सकता है, परास्त कर सकता है
भावार्थ--
हे इन्द्र(प्रभो)! जो मनुष्य आपकी कृपा और सहायता से सम्पन्न है, उस मनुष्य का कोई भी मर्त्य (दुश्मन या विरोधी) कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता।
अर्थात — जिस पर परम शक्तिशाली दैवी शक्ति की कृपा होती है, उसका कोई तिरस्कार या पराजय नहीं कर सकता।
वेदों में प्रमाण--
1. ऋग्वेद प्रमाण--
मन्त्र:
न तस्य मायया चन रिपुरीशीत मर्त्यः।यो अग्नये ददाश हव्यदातये॥
— ऋग्वेद 1.99.1
भावार्थ--
जो मनुष्य ईश्वर (अग्नि) की उपासना करता है, उसका कोई शत्रु कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता।
2. ऋग्वेद प्रमाण--
न तं हिन्वन्ति शत्रवो न देवा अमीवाः।
यो ब्रह्माणं ब्रह्मणा वावृधे॥
— ऋग्वेद 6.75.19
भावार्थ--
जो व्यक्ति ईश्वर और ब्रह्मविद्या का आश्रय लेता है, उसे शत्रु या विपत्तियाँ हानि नहीं पहुँचा सकतीं।
3. ऋग्वेद प्रमाण--
इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुरः कृण्वाना यज्ञं उतये।
स नो मघवा पुरुहूतः पुरुस्तुतो रक्षिता॥
— ऋग्वेद 1.9.1
भावार्थ--
हम इन्द्र (परम शक्ति) की उपासना करते हैं; वही हमारी रक्षा करने वाला है।
4. यजुर्वेद प्रमाण--
तेजोऽसि तेजो मयि धेहि।
वीर्यमसि वीर्यं मयि धेहि।
— यजुर्वेद 19.9
भावार्थ--
हे परमात्मा! तू तेजस्वरूप है, मुझे भी तेज प्रदान कर। तेरी शक्ति से मनुष्य शक्तिशाली और अजेय बनता है।
5. अथर्ववेद प्रमाण--
यस्य देवा उपासते तस्य नाशो न विद्यते।
भावार्थ--
जिसकी रक्षा और सहायता देव करते हैं, उसका विनाश नहीं होता।
निष्कर्ष:--
वेदों का सिद्धान्त है कि जो मनुष्य ईश्वर की उपासना, सत्य और धर्म में स्थित रहता है, उसका शत्रु कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता।
उपनिषद से प्रमाण--
1. कठोपनिषद--
नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो
न च प्रमादात् तपसो वाप्यलिङ्गात्।
एतैरुपायैर्यतते यस्तु विद्वान्
तस्यैष आत्मा विशते ब्रह्मधाम॥
— कठोपनिषद् 1.2.23
भावार्थ:
यह आत्मा (परमात्मा) निर्बल, प्रमादी या असंयमी को प्राप्त नहीं होता।
जो पुरुष श्रद्धा, तप और ज्ञान से इसका अनुसरण करता है, उसी को यह परमात्मा प्राप्त होता है और वह दिव्य स्थिति को प्राप्त होकर अजेय बन जाता है।
2. मुण्डक उपनिषद--
भिद्यते हृदयग्रन्थिः
छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि
तस्मिन् दृष्टे परावरे॥
— मुण्डक उपनिषद् 2.2.8
भावार्थ:
जब मनुष्य परमात्मा को जान लेता है तब उसके हृदय के बन्धन टूट जाते हैं, सभी संशय नष्ट हो जाते हैं और उसके कर्मों के बन्धन भी समाप्त हो जाते हैं।
अर्थात वह किसी भी भय या पराजय से ऊपर उठ जाता है।
3. तैत्तिरीय उपनिषद--
ब्रह्मविद् आप्नोति परम्।
— तैत्तिरीय उपनिषद् 2.1
भावार्थ:
जो ब्रह्म (परमात्मा) को जानता है वह परम स्थिति को प्राप्त करता है; ऐसी अवस्था में कोई उसे पराजित नहीं कर सकता।
4. श्वेताश्वतर उपनिषद--
यो देवं सर्वभूतेषु गूढं
सर्वव्यापिनमात्मानम्।
ज्ञात्वा धीराः अमृतत्वं
भजन्ते॥
श्वेताश्वतर उपनिषद् 3.7
भावार्थ:
जो धीर पुरुष सर्वव्यापी परमात्मा को जान लेते हैं, वे अमृत (अविनाशी) स्थिति को प्राप्त होते हैं।
५. बृहदारण्यक उपनिषद
अभयं वै जनक प्राप्नोति य एवं वेद।
बृहदारण्यक उपनिषद् 4.2.4
भावार्थ:
जो मनुष्य परमात्मा का यथार्थ ज्ञान प्राप्त कर लेता है, वह पूर्ण निर्भयता को प्राप्त होता है। उसे किसी से भय नहीं रहता।
६- छान्दोग्य उपनिषद
तारति शोकम् आत्मवित्।
— छान्दोग्य उपनिषद् 7.1.3
भावार्थ:
जो आत्मा (परमात्मा) को जान लेता है, वह सभी शोकों और दुःखों से पार हो जाता है। अर्थात उसे संसार की विपत्तियाँ पराजित नहीं कर सकतीं।
७. ईशावास्य उपनिषद
मन्त्र:
यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद् विजानतः।
तत्र को मोहः कः शोकः एकत्वमनुपश्यतः॥
— ईशावास्य उपनिषद् 7
भावार्थ:
जिस ज्ञानी को सब प्राणियों में एक ही परमात्मा दिखाई देता है, उसके लिए न मोह रहता है न शोक। वह पूर्ण शान्त और निर्भय हो जाता है।
८. श्वेताश्वतर उपनिषद
मन्त्र:
तमेव विदित्वा अतिमृत्युमेति
नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥
— श्वेताश्वतर उपनिषद् 3.8
भावार्थ:
उसी परमात्मा को जानकर मनुष्य मृत्यु और दुःख से पार हो जाता है; मुक्ति का दूसरा कोई मार्ग नहीं है।
निष्कर्ष--:
उपनिषदों का स्पष्ट सिद्धान्त है कि जो परमात्मा को जानता या उसकी शरण में रहता है, वह निर्भय, शोक-रहित और अजेय हो जाता है। इसलिए उसका वास्तविक तिरस्कार या पराजय कोई नहीं कर सकता।
पुराणों से प्रमाण---
1. भागवत पुराण--
न मे भक्तः प्रणश्यति।
भावार्थ:
भगवान कहते हैं — मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।
अर्थात ईश्वर अपने भक्त की रक्षा करते हैं।
2. विष्णु पुराण--
सर्वभूतेषु यः पश्येद् भगवान् वासुदेवं हरिम्।
तस्य नश्यन्ति पापानि न भयं विद्यते क्वचित्॥
भावार्थ:
जो मनुष्य सभी प्राणियों में भगवान को देखता है, उसके पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे कहीं भी भय नहीं रहता।
3. शिव पुराण--
शिवभक्तो हि लोकेऽस्मिन् न भयम् लभते क्वचित्।
शिवस्य कृपया नित्यं रक्षितो भवति ध्रुवम्॥
भावार्थ:
शिवभक्त को संसार में कहीं भी भय नहीं रहता, क्योंकि भगवान शिव की कृपा से वह सदा सुरक्षित रहता है।
4. पद्म पुराण--
यत्र भक्तो हरिर्नित्यं तत्र तिष्ठामि नारद।
भक्तरक्षा मम धर्मः।
भावार्थ:
भगवान कहते हैं — जहाँ मेरा भक्त होता है, वहाँ मैं स्वयं उपस्थित रहता हूँ और उसकी रक्षा करना मेरा धर्म है।
५. स्कन्द पुराण--
न भयं विद्यते तस्य
यस्य भक्तिर्जनार्दने।
रक्षति तं सदा विष्णुः
भक्तवत्सल ईश्वरः॥
भावार्थ:
जिस मनुष्य की भगवान में भक्ति होती है, उसे किसी प्रकार का भय नहीं रहता; भगवान स्वयं उसकी रक्षा करते हैं।
६. गरुड़ पुराण--
हरिभक्तपरायणः
न तस्य विघ्नाः भवन्ति।
भावार्थ:
जो मनुष्य भगवान की भक्ति में लगा रहता है, उसके मार्ग में विघ्न और बाधाएँ टिक नहीं पातीं।
७. नारद पुराण--
भक्तानां रक्षणार्थाय
हरिः सर्वत्र गच्छति।
भावार्थ:
भगवान अपने भक्तों की रक्षा के लिए हर स्थान पर उपस्थित रहते हैं।
८. मार्कण्डेय पुराण--
यत्र देवभक्तिर्भवति
तत्र जयः सदा ध्रुवः।
भावार्थ:
जहाँ ईश्वर की भक्ति होती है, वहाँ निश्चित रूप से विजय होती है।
निष्कर्ष:
पुराणों का भी यही सिद्धान्त है कि ईश्वर-भक्ति मनुष्य को निर्भय और सुरक्षित बनाती है; ईश्वर स्वयं भक्त की रक्षा करते हैं, इसलिए उसका अनिष्ट या तिरस्कार कोई नहीं कर सकता।
भगवद्गीता में प्रमाण-
1.भगवद्गीता-- 9.31
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥
भावार्थ:
हे अर्जुन! तू निश्चयपूर्वक घोषणा कर दे कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।
अर्थात भगवान अपने भक्त की रक्षा अवश्य करते हैं।
2. भगवद्गीता-- 9.22
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥
भावार्थ:
जो भक्त अनन्य भाव से मेरी उपासना करते हैं, उनके योग (जो नहीं है उसे प्राप्त कराना) और क्षेम (जो है उसकी रक्षा करना) का भार मैं स्वयं उठाता हूँ।
3. भगवद्गीता-- 12.6–7
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते॥
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युंसंसारसागरात्॥
भावार्थ:
जो भक्त अपने सभी कर्म मुझे अर्पित करके मेरी उपासना करते हैं, मैं स्वयं उन्हें संसार रूपी मृत्यु-सागर से बचा लेता हूँ।
4. भगवद्गीता-- 18.66
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
भावार्थ:
सब धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आओ; मैं तुम्हें सभी पापों और संकटों से मुक्त कर दूँगा, इसलिए शोक मत करो।
निष्कर्ष:
गीता का स्पष्ट सिद्धान्त है कि जो मनुष्य सच्चे भाव से भगवान की शरण में रहता है, उसकी रक्षा स्वयं भगवान करते हैं; इसलिए उसका वास्तविक अनिष्ट कोई नहीं कर सकता।
1. महाभारत (वनपर्व)
न हि कल्याणकृत् कश्चिद्
दुर्गतिं तात गच्छति।
भावार्थ:
जो मनुष्य शुभ कर्म करता है और धर्म के मार्ग पर चलता है, वह कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।
2. महाभारत (शान्तिपर्व)
धर्मो रक्षति रक्षितः
धर्मो हन्ति हतं नृणाम्।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो
मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥
भावार्थ:
जो मनुष्य धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
अर्थात धर्मात्मा या ईश्वर-भक्त का अनिष्ट नहीं होता।
3. महाभारत (भीष्मपर्व)
यतो धर्मस्ततो जयः।
भावार्थ:
जहाँ धर्म है, वहाँ निश्चित ही विजय होती है।
4. महाभारत (शान्तिपर्व)
न देवाः दण्डमादाय
रक्षन्ति पशुपालवत्।
यं तु रक्षितुमिच्छन्ति
बुद्ध्या संयोजयन्ति तम्॥
भावार्थ:
देवता किसी को डंडा लेकर नहीं बचाते; वे जिसकी रक्षा करना चाहते हैं, उसे सही बुद्धि देकर उसकी रक्षा करते हैं।
निष्कर्ष:
महाभारत का भी यही सिद्धान्त है कि जो मनुष्य धर्म और ईश्वर की शरण में रहता है, उसकी रक्षा स्वयं धर्म और दैवी शक्ति करती है; इसलिए उसका अनिष्ट कोई नहीं कर सकता।
स्मृतियों में “ईश्वर-भक्त या धर्माचरण करने वाले मनुष्य का अनिष्ट नहीं होता।”
स्मृति ग्रन्थों में प्रमाण--
1. मनुस्मृति
धर्म एव हतो हन्ति
धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो
मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥
— मनुस्मृति 8.15
भावार्थ:
धर्म का नाश करने वाला स्वयं नष्ट हो जाता है और धर्म की रक्षा करने वाले की धर्म रक्षा करता है। इसलिए धर्म को कभी नष्ट नहीं करना चाहिए।
2. याज्ञवल्क्य स्मृति--
धर्मेण पापमपनुदति
धर्मे सर्वं प्रतिष्ठितम्।
भावार्थ:
धर्म के द्वारा पाप नष्ट हो जाते हैं और संसार की स्थिरता भी धर्म पर ही आधारित है; इसलिए धर्माचरण करने वाला सुरक्षित रहता है।
3. पाराशर स्मृति--
धर्मेणैव जगत्सर्वं
धर्मे सर्वं प्रतिष्ठितम्।
धर्माद् न परमो लाभः॥
भावार्थ:
सारा संसार धर्म पर आधारित है; धर्म से बढ़कर कोई लाभ नहीं है। इसलिए धर्म का पालन करने वाला व्यक्ति कल्याण को प्राप्त होता है।
4. अत्रि स्मृति--
धर्मशीलस्य लोकेऽस्मिन्
न कदाचित् पराभवः।
भावार्थ:
जो मनुष्य धर्मशील है, उसे संसार में कभी पराजय नहीं होती।
निष्कर्ष:
स्मृतियों का भी यही सिद्धान्त है कि धर्म और ईश्वर की शरण में रहने वाले मनुष्य की रक्षा स्वयं धर्म करता है; इसलिए उसका अनिष्ट या तिरस्कार कोई नहीं कर सकता।“धर्म या ईश्वर के आश्रित मनुष्य का अनिष्ट नहीं होता, अन्ततः उसकी ही विजय होती है”।
नीति-ग्रन्थों से प्रमाण--
1. हितोपदेश
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्
न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयात्
एष धर्मः सनातनः॥
भावार्थ:--
मनुष्य को सत्य और धर्म का पालन करना चाहिए; जो धर्म का पालन करता है उसका कल्याण होता है।
2. पञ्चतंत्र---
धर्मो हि तेषामधिकः विशेषः
धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः।
भावार्थ:
धर्म ही मनुष्य की श्रेष्ठता का कारण है; धर्म के बिना मनुष्य पशु के समान हो जाता है।
अर्थात धर्म का पालन करने वाला व्यक्ति श्रेष्ठ और सुरक्षित रहता है।
3. चाणक्य नीति--
धर्मेण जयते लोकः
धर्मेण पापं नश्यति।
धर्मे सर्वं प्रतिष्ठितम्॥
भावार्थ:
धर्म से ही संसार में विजय होती है, धर्म से पाप नष्ट होते हैं और सब कुछ धर्म पर ही आधारित है।
4. नीतिशतक--
सत्येन धार्यते पृथ्वी
सत्येन तपते रविः।
सत्येन वायवो वान्ति
सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम्॥
भावार्थ:--
सत्य और धर्म से ही संसार का संचालन होता है; इसलिए सत्यनिष्ठ और धर्मनिष्ठ व्यक्ति का अन्ततः कल्याण और विजय होती है।
निष्कर्ष:--
नीति-ग्रन्थों का भी यही सिद्धान्त है कि धर्म, सत्य और ईश्वर के मार्ग पर चलने वाले मनुष्य का अन्ततः कल्याण होता है; उसका वास्तविक अनिष्ट कोई नहीं कर सकता।
“ईश्वर-भक्त या आत्मज्ञानी का अनिष्ट कोई नहीं कर सकता, वह निर्भय और अजेय हो जाता है”— यह सिद्धान्त योग वशिष्ठ में भी अनेक स्थानों पर मिलता है।
नीचे कुछ प्रमाण श्लोक अर्थ सहित दिए जा रहे हैं —
1. योग वशिष्ठ--
यस्य चित्तं समाधाने
स्थितं ब्रह्मणि निश्चलम्।
तं न बाधन्ति दुःखानि
सागरं सलिलानि इव॥
भावार्थ:
जिस मनुष्य का चित्त ब्रह्म (परमात्मा) में स्थिर हो जाता है, उसे दुःख और संकट प्रभावित नहीं कर सकते; जैसे विशाल समुद्र को छोटी तरंगें विचलित नहीं कर पातीं।
2. योग वशिष्ठ--
आत्मज्ञानसमायुक्तं
न शक्नुवन्ति बाधितुम्।
दुःखानि भोगसङ्घाश्च
दीपं तम इव क्षणात्॥
भावार्थ:
जो मनुष्य आत्मज्ञान से युक्त है, उसे दुःख और संकट बाधित नहीं कर सकते; जैसे दीपक के सामने अन्धकार टिक नहीं पाता।
3. योग वशिष्ठ--
श्लोक:
ब्रह्मभावे स्थितस्यास्य
न भयं विद्यते क्वचित्।
भावार्थ:
जो मनुष्य ब्रह्मभाव में स्थित हो जाता है, उसे कहीं भी किसी प्रकार का भय नहीं रहता।
निष्कर्ष:--
योग वशिष्ठ का सिद्धान्त भी यही है कि जो मनुष्य परमात्मा के ज्ञान या भक्ति में स्थित हो जाता है, वह निर्भय और अजेय हो जाता है; संसार की कोई शक्ति उसका वास्तविक अनिष्ट नहीं कर सकती।
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