किसने लिखा है नसीब।
हर मोड़ पे जो सवाल बन जाए अजीब,
दिल पूछता है, किसने लिखा है नसीब।
हमने तो जलाकर ख़्वाहिशों के चराग़,
अँधेरों ने कहा, किसने लिखा है नसीब।
हर दर्द को तक़दीर का नाम दे दिया,
पर ज़ख़्म से पूछो, किसने लिखा है नसीब।
जो हाथ थामे थे उम्र भर के लिए,
वो छूट गए, किसने लिखा है नसीब।
मेहनत ने कहा, “मैं अधूरी नहीं,”
फिर हार ने टोका, किसने लिखा है नसीब।
जो सब्र को ताक़त समझ बैठा था दिल,
रो पड़ा जब जाना, किसने लिखा है नसीब।
प्रसंग, गुनाह अपने थे या वक़्त का खेल,
इतिहास भी चुप है, किसने लिखा है नसीब।
"प्रसंग"
प्रणयराज रणवीर