ऋगुवेद सूक्ति-- (२४) की व्याख्या
“अघृणे न ते सख्याय पह्युवे” — ऋगुवेद _१/१३८/४
पदच्छेद--
अघृणे — हे प्रकाशस्वरूप, दयालु (अग्नि/ईश्वर के लिए संबोधन)
न — नहीं
ते — तेरी
सख्याय — मित्रता के लिए
पह्युवे (अपह्नुये) — इन्कार करता हूँ / अस्वीकार करता हूँ
भावार्थ--
हे प्रकाशमय प्रभु! मैं तेरी मित्रता से इन्कार नहीं करता।
अर्थात् — मैं तेरे स्नेह, संरक्षण और मार्गदर्शन को स्वीकार करता हूँ। मैं तुझसे दूर नहीं होना चाहता, बल्कि तेरे साथ मैत्रीभाव बनाए रखना चाहता हूँ।
आध्यात्मिक संकेत--
वेदों में “सख्य” (मित्रता) का अर्थ केवल सांसारिक मित्रता नहीं, बल्कि—
ईश्वर के साथ आत्मीय सम्बन्ध
उसके नियमों को स्वीकार करना
उसके प्रकाश में चलना अपने अहंकार का त्याग करना
यह मन्त्र साधक की विनम्र प्रार्थना है कि वह ईश्वर से विमुख न हो, बल्कि उसके प्रकाश में स्थिर रहे।
अन्य वेदों में प्रमाण--
१. यजुर्वेद--
(अ) “मित्रस्य मा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्” (यजुर्वेद 36/18)
भावार्थ:
सब प्राणी मुझे मित्र की दृष्टि से देखें और मैं सबको मित्रभाव से देखूँ।
यहाँ “मित्र-दृष्टि” का अर्थ है — सार्वभौमिक मैत्री, जो ईश्वर-संबंध का विस्तार है।
२. सामवेद--
सामवेद में ऋग्वैदिक मन्त्रों का ही गायन है।
एक मन्त्र में आता है —
“सखा सखिभ्य ईड्यः” (सामवेद 373 के समीप पाठ)
भावार्थ:
वह (ईश्वर/अग्नि) अपने भक्तों का सखा (मित्र) है, स्तुति के योग्य है।
यहाँ ईश्वर को प्रत्यक्ष “सखा” कहा गया है।
३. अथर्ववेद --
“सखा सख्ये नय”
अथर्ववेद-- 3/30
भावार्थ:
हे प्रभु! हमें सखा की भाँति सही मार्ग पर ले चल।
यहाँ ईश्वर को मार्गदर्शक मित्र माना गया है।
समग्र वैदिक दृष्टि--
वेदों में ईश्वर केवल दण्डदाता नहीं, बल्कि सखा (मित्र), सुहृद् (हितैषी) ,मार्गदर्शक और
प्रकाशदाता के रूप में आया है।
इस प्रकार “तेरी मित्रता से इन्कार नहीं करता” — यह भाव सम्पूर्ण वैदिक साहित्य में व्याप्त है।
उपनिषदों में प्रमाण-- --
१. श्वेताश्वतर उपनिषद--४.६-७
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया
समानं वृक्षं परिषस्वजाते।
भावार्थ:
दो सुंदर पक्षी, जो घनिष्ठ सखा हैं, एक ही वृक्ष (शरीर) पर साथ-साथ रहते हैं।
यहाँ “सखाया” शब्द स्पष्ट करता है कि जीव और परमात्मा का सम्बन्ध सखा जैसा आत्मीय है। परमात्मा कभी त्यागता नहीं; जीव जब उसकी ओर देखता है, तब शोक से मुक्त हो जाता है।
२-बृहदारण्यक उपनिषद -१.३.२८
असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मा अमृतं गमय॥
भावार्थ:
हे प्रभु! मुझे असत्य से सत्य की ओर, अन्धकार से प्रकाश की ओर, मृत्यु से अमृत की ओर ले चल।
यह प्रार्थना उसी सखा-भाव की अभिव्यक्ति है— जैसे मित्र मार्ग दिखाता है, वैसे ही परमात्मा को सम्बोधित किया गया है।
३. कठ उपनिषद-१.२.२३
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः
तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्।
भावार्थ:
जिसे यह (परमात्मा) स्वयं स्वीकार करता है, उसी को वह प्राप्त होता है; और उसी पर अपना स्वरूप प्रकट करता है।
यहाँ परमात्मा को कृपालु, आत्मीय एवं अनुग्रही मित्र के रूप में दिखाया गया है।
४- मुण्डक उपनिषद -३.१.१
(श्वेताश्वतर के समान ही “द्वा सुपर्णा” मन्त्र)
यहाँ भी जीव-परमात्मा के सख्यभाव का वही चित्र मिलता है।
उपनिषदों का निष्कर्ष--
उपनिषद बताते हैं कि—
परमात्मा दूर नहीं, अन्तःस्थित सखा है।
वह दण्डदाता से अधिक प्रकाशदाता और मार्गदर्शक मित्र है।
जब जीव उसकी ओर मुड़ता है, तो शोक और भय से मुक्त होता है।
अतः ऋग्वैदिक भाव — “तेरी मित्रता से इन्कार नहीं करता” — उपनिषदों में और भी गहराई से प्रतिपादित है।
अन्य उपनिषदों में प्रमाण--
१. ईश उपनिषद-६-७
“यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यति।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते॥”
भावार्थ:
जो पुरुष सब भूतों को अपने आत्मा में और अपने आत्मा को सब भूतों में देखता है, वह किसी से द्वेष नहीं करता।
जब सबमें एक ही आत्मा का दर्शन होता है, तब सार्वभौमिक मैत्री उत्पन्न होती है — यही सख्यभाव का उच्चतम रूप है।
२. छान्दोग्य उपनिषद -६.८.७
“तत्त्वमसि श्वेतकेतो।”
भावार्थ:
हे श्वेतकेतु! तू वही (ब्रह्म) है। यहाँ गुरु जीव को उसके परम आत्मीय स्वरूप से जोड़ता है। यह भेद-निवृत्ति का उपदेश है, जहाँ परमात्मा और जीव में विरोध नहीं, अपितु आत्मीय एकत्व है।
३. तैत्तिरीय उपनिषद् -२.७
“रसो वै सः।
रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति।”
भावार्थ:
वह (ब्रह्म) रसस्वरूप है; उसे प्राप्त कर मनुष्य आनन्दित होता है।
मित्रता का सार आनन्द और आत्मीयता है। ब्रह्म को “रस” और “आनन्द” कहा गया— यह दण्ड नहीं, बल्कि स्नेहपूर्ण निकटता का
स्वरूप है।
४-मैत्री उपनिषद-६.३०
एको देवः सर्वभूतेषु गूढः
सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।
कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः
साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च॥”
भावार्थ--
एक ही परम देव सब प्राणियों में गुप्त रूप से स्थित है। वह सर्वव्यापी, सबका अन्तरात्मा, कर्मों का अध्यक्ष, सबका आधार, साक्षी, चेतनस्वरूप और निर्गुण है।
यहाँ परमात्मा को सबके हृदय में स्थित अन्तर्यामी कहा गया है — जो निकटतम आत्म-सखा के समान है।
५-प्रश्न उपनिषद ,-६.३
षष्ठ प्रश्न में पिप्पलाद ऋषि ब्रह्मविद्या का उपदेश देते हैं।
“स प्राणमसृजत।
प्राणाच्छ्रद्धां खं वायुर् ज्योतिरापः पृथिवीन्द्रियं मनः।
अन्नाद् वीर्यं तपो मन्त्राः कर्म लोकाः नाम च॥
भावार्थ--
यहाँ आत्मा को हृदय में स्थित, सर्वप्रिय और साक्षी कहा गया है।
भावार्थ: परमात्मा मनुष्य के अत्यन्त समीप, अन्तरंग सखा की भाँति हृदय में स्थित है।
सम्पूर्ण उपनिषद्-दृष्टि-+
उपनिषदों में परमात्मा—
अन्तर्यामी सखा, प्रियतम आत्मस्वरूप, आनन्दघन,सर्वभूत मित्र के रूप में प्रतिपादित है।
पुराणों से प्रमाण—
१. भागवत महापुराण-
(क) १०.१४.५५
“भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।”
(संदर्भ: भगवान का भक्त–सख्यभाव)
भावार्थ:
भगवान अनन्य भक्ति से ही प्राप्त होते हैं— जहाँ वह भक्त का अपना, आत्मीय सखा बन जाते हैं।वेदोक्त ईश्वर–सख्य/सुहृद्-भाव का प्रतिपादन अनेक पुराणों में स्पष्ट श्लोकों सहित मिलता है। नीचे प्रमुख प्रमाण अर्थ सहित प्रस्तुत हैं—
१-भागवत महापुराण--
(ख)१०.१४.८
तत्तेऽनुकम्पां सु-समीक्षमाणो
भुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम्।
हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते
जीवेत् यो मुक्तिपदे स दायभाक्॥
भावार्थ:
जो व्यक्ति अपने कर्मों के फल को आपकी कृपा समझकर सहता है और हृदय, वाणी तथा शरीर से आपको नमस्कार करता रहता है, वह आपके मुक्तिपद का अधिकारी बनता है।
यहाँ भगवान को करुणामय, हितकारी सखा के रूप में स्वीकार किया गया है।
२. विष्णु पुराण -३.७.१४
“यः सर्वभूतानां सुहृदेक एव।”
भावार्थ:
वह (भगवान विष्णु) समस्त प्राणियों का एकमात्र सच्चा सुहृद् (हितैषी मित्र) है।
३.शिव पुराण--
“भक्तवत्सलः शम्भुः शरणागतवत्सलः।”
भावार्थ:
भगवान शम्भु भक्तों से स्नेह करने वाले और शरणागतों पर कृपा करने वाले हैं।
४- पद्म पुराण - (उत्तरखण्ड)
“स्मर्तव्यः सततं विष्णुः विस्मर्तव्यो न जातुचित्।”
भावार्थ:
विष्णु का सदा स्मरण करना चाहिए, उन्हें कभी नहीं भूलना चाहिए।
निरन्तर स्मरण का आधार भय नहीं, बल्कि आत्मीय मैत्री है।
५- स्कंद पुराण --
“सकृदपि स्मृतो देवः सर्वदुःखं व्यपोहति।”
भावार्थ:
भगवान का एक बार भी स्मरण करने से वह सब दुःख दूर कर देते हैं।
यह मित्रवत् करुणा और संरक्षण का द्योतक है।
निष्कर्ष--
पुराणों में भगवान—
सुहृद् (सच्चा हितैषी)
भक्तवत्सल, शरणागत-रक्षक
करुणामय सखा के रूप में वर्णित हैं।
भगवत् गीता में प्रमाण--
भगवत् गीता में भगवान स्वयं को भक्त का सखा, सुहृद् और प्रिय बताते हैं।
१. अध्याय 4, श्लोक 3
“स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्॥”
भावार्थ:
तू मेरा भक्त और सखा है; इसलिए मैं यह उत्तम रहस्य तुझे कह रहा हूँ।
यहाँ भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को स्पष्ट रूप से “सखा” कहते हैं। यह ईश्वर–मित्रता का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
२. अध्याय 5, श्लोक 29
“भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥”
भावार्थ:
मुझे यज्ञ-तप का भोक्ता, समस्त लोकों का ईश्वर और सभी प्राणियों का सुहृद् (हितैषी मित्र) जानकर मनुष्य शान्ति प्राप्त करता है।
यहाँ भगवान स्वयं को “सुहृदं सर्वभूतानाम्” कहते हैं — अर्थात् सबका सच्चा मित्र।
३. अध्याय 9, श्लोक 18
“गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्।”
भावार्थ:
मैं ही गति, पालनकर्ता, प्रभु, साक्षी, निवास, शरण और सुहृद् (मित्र) हूँ।
ईश्वर केवल शासक नहीं, बल्कि शरणदाता और मित्र भी है।
४. अध्याय 18, श्लोक 64
“सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्॥”
भावार्थ:
तू मुझे अत्यन्त प्रिय है; इसलिए मैं तेरे हित की बात कहूँगा।
यहाँ भगवान अर्जुन को “प्रिय” कहकर आत्मीय स्नेह व्यक्त करते हैं यही सख्यभाव की पराकाष्ठा है।
महाभारत में प्रमाण--
१. उद्योगपर्व (कृष्ण–अर्जुन सख्य)
उद्योगपर्व में श्रीकृष्ण को अर्जुन का अत्यन्त प्रिय सखा कहा गया है।
भावार्थ: कृष्ण और अर्जुन का संबंध केवल राजा–सारथी का नहीं, बल्कि आत्मीय मित्रों का है, जो धर्मस्थापन के लिए साथ खड़े हैं।
२. भीष्मपर्व (गीता-प्रसंग)
भीष्मपर्व में ही भगवत गीता का उपदेश है, जहाँ कृष्ण अर्जुन को “सखा” कहते हैं (4.3)।
यह दर्शाता है कि महाभारत के मूल कथानक में भी ईश्वर–सख्यभाव केंद्रीय है।
३. शान्तिपर्व (नारायणीय उपाख्यान)
शान्तिपर्व में कहा गया है कि भगवान नारायण भक्तों के सुहृद् और रक्षक हैं।
भावार्थ: जो श्रद्धा से उनकी शरण लेते हैं, वे उनके हितैषी मित्र बनकर रक्षा करते हैं।
४. वनपर्व (द्रौपदी-रक्षा प्रसंग)
वनपर्व में संकट की घड़ी में द्रौपदी श्रीकृष्ण को पुकारती है।
भावार्थ: भगवान सच्चे मित्र की भाँति संकट में सहायता करते हैं; वे शरणागत का त्याग नहीं करते।
५. कर्णपर्व (अर्जुन का संबोधन)
युद्ध के समय अर्जुन बार-बार कृष्ण को अपने सखा और मार्गदर्शक रूप में स्वीकार करता है।
यह दर्शाता है कि वीरता का आधार भी ईश्वर-मित्रता में है।
महाभारत का निष्कर्ष--
महाभारत में भगवान—
सखा (मित्र), सुहृद् (हितैषी)
शरणदाता धर्ममार्ग के मार्गदर्शक
रूप में चित्रित हैं।
स्मृति ग्रन्थों में प्रमाण--
१-(क) मनुस्मृति -४.१३८
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥
अर्थ: सत्य बोलो, प्रिय बोलो; अप्रिय सत्य न बोलो; और प्रिय बोलने के लिए असत्य भी न बोलो—यह सनातन धर्म है।
धर्म का यह रूप लोक-हितकारी है; वही हितकारी मार्ग सच्चे मित्र की भाँति कल्याण करता है।
(ख) मनुस्मृति -- ८.१५
धर्मो रक्षति रक्षितो धर्मो हन्ति हतः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥
अर्थ: जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है; जो धर्म का नाश करता है, धर्म उसका नाश करता है। इसलिए धर्म का नाश न करो।
धर्म-आश्रय रक्षक है—हितैषी सुहृद् के समान।
३-(क) याज्ञवल्क्य स्मृति- १.१२२
वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः।
एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम्॥
अर्थ: वेद, स्मृति, सज्जनों का आचरण और अपने आत्मा को प्रिय (अहिंसक/शुभ) आचरण—ये चार धर्म के लक्षण हैं।
धर्म का मापदण्ड लोक-कल्याण और अन्तःकरण-शुद्धि है।
(ख) याज्ञवल्क्य स्मृति -
३.३१३
अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
एतं सामासिकं धर्मं चातुर्वर्ण्येऽब्रवीन्मनुः॥
अर्थ: अहिंसा, सत्य, अस्तेय, शौच और इन्द्रियनिग्रह—यह संक्षेप में धर्म है।
ये गुण सार्वभौमिक हित के आधार हैं।
(४) पराशर स्मृति -१.२४
कृते यद्ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखैः।
द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्तनात्॥
अर्थ: सत्ययुग में ध्यान, त्रेता में यज्ञ, द्वापर में पूजा से जो फल मिलता है, कलियुग में वही हरि-कीर्तन से मिलता है।
कलियुग में स्मरण-भक्ति को सुलभ, हितकारी आश्रय बताया गया है।
(५) नारद स्मृति --१.२–३
धर्मशास्त्रं तु विज्ञेयं न्यायशास्त्रसमन्वितम्।
अर्थ: धर्मशास्त्र न्याय के साथ समझा जाना चाहिए।
न्याय-आधारित धर्म लोक-हित और संरक्षण का साधन है।
साराश--
स्मृतियाँ सिखाती हैं कि—
धर्म रक्षक है (मनु 8.15)।
सत्य, अहिंसा, शौच, इन्द्रियनिग्रह धर्म के आधार हैं (याज्ञवल्क्य 3.313)।
नीति-ग्रन्थों में प्रमाण—
१. हितोपदेश_
“सज्जनानां हृदयं नवनीतसमम्।”
भावार्थ: सज्जनों का हृदय नवनीत (मक्खन) के समान कोमल होता है।
सच्चा मित्र वही है जो हितचिन्तक और करुणामय हो— ईश्वर को भी वेदों में ऐसा ही सुहृद् कहा गया है।
२. पंचतंत्र (मित्रलाभ)-
“आपत्सु मित्रं ज्ञायते।”
भावार्थ: विपत्ति में ही मित्र की पहचान होती है।
परमात्मा को भी शास्त्र संकट में साथ देने वाला सखा बताते हैं; यह नीति-सिद्धान्त उसी सत्य को व्यावहारिक रूप देता है।
३. चाणक्य नीति--
“परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्।
वर्जयेत् तादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम्॥”
भावार्थ: जो सामने मधुर बोले और पीछे हानि करे, ऐसे मित्र को त्याग देना चाहिए।
सच्चा मित्र कपटहीन होता है— ईश्वर का सख्यभाव भी निष्कपट और कल्याणकारी है।
४-भृतुहरि नीति शतक
“संतः स्वयं परहिते विहिताभियोगाः।”
भावार्थ: सज्जन स्वयं ही दूसरों के हित में लगे रहते हैं।
‘परहित’ का यह आदर्श वेद के सुहृद् (हितैषी) ईश्वर की झलक देता है।
निष्कर्ष-
नीति-ग्रन्थ बताते हैं कि—
सच्चा मित्र हितैषी होता है
विपत्ति में साथ देता है
कपट से रहित होता है।
योग वाशिष्ठ में प्रमाण --नीचे योग वशिष्ठ से ईश्वर/आत्मा के हितैषी-मित्र (सुहृद्) स्वरूप का प्रतिपादन करने वाले प्रमुख श्लोक अर्थ सहित दिए जा रहे हैं
(१) आत्मा ही सच्चा मित्र
“आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।”
(निर्वाणप्रकरण, पूर्वार्ध —
अर्थ: मनुष्य का आत्मा ही उसका मित्र है और वही (अविवेक से) शत्रु भी बन जाता है।
जब चित्त शुद्ध और विवेकी होता है, वही अन्तःस्थित आत्मा परम हितकारी सखा का अनुभव कराता है।
(२) ब्रह्म सर्वान्तर्यामी सुहृद्
“एको ब्रह्म परं शान्तं सर्वभूतान्तरात्मकम्।
नित्यं सुहृद् सर्वभूतानां तस्मै नमो नमः॥”
(उपशमप्रकरण)
अर्थ: एक ही परम, शान्त ब्रह्म सब प्राणियों का अन्तरात्मा है; वह सबका नित्य सुहृद् है—उसे बार-बार नमस्कार।
यहाँ ब्रह्म को स्पष्ट रूप से सर्वभूत-सुहृद् कहा गया है।
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