जाने ही दो।
जिन्हें जाना है उसे अब जाने ही दो,
वक़्त फिर दोहराए तो दोहराने ही दो।
जो मुक़द्दर में लिखा है वही होना है यहाँ,
लफ़्ज़ों को तक़दीर समझाने ही दो।
इश्क़ जब ख़ुद से मुलाक़ात करा देता है,
दर्द को दिल से रिश्ता निभाने ही दो।
कुछ सवालात के जवाब नहीं होते कभी,
ख़ामोशी को ही सब कुछ बताने ही दो।
रूह जब बोझ से आज़ाद हो जाती है यहाँ,
जिस्म को थोड़ा सा बेगाना रहने ही दो।
हर क़दम फ़ासला तय करता है ख़ुद-ब-ख़ुद,
रास्तों को ही मंज़िल बताने ही दो।
सूफ़ियाना है ये दस्तूर-ए-मोहब्बत “प्रसंग”,
दिल जले तो उसे सज्दे में आने ही दो।
प्रसंग
प्रणयराज रणवीर