Hindi Quote in Poem by Sudhir Srivastava

Poem quotes are very popular on BitesApp with millions of authors writing small inspirational quotes in Hindi daily and inspiring the readers, you can start writing today and fulfill your life of becoming the quotes writer or poem writer.

दोहा - कहें सुधीर कविराय
************
प्रेम दिवस
*********
मर्यादा के साथ ही, करो आप सब प्यार।
ऐसा कुछ करिए नहीं, नाहक हो तकरार।।

प्रेम धर्म ईमान से, हमको करना प्यार।
अभिव्यक्ति के नाम पर, व्यर्थ नहीं तकरार।।

प्रेम दिवस पर कीजिए, मर्यादित व्यवहार।
दूषित करना है नहीं, सामाजिक संस्कार।।

प्रेम दिवस पर लीजिए, आप सभी का प्यार।
उत्साही इतना नहीं, मिले मुफ्त में मार।।

प्रेम दिवस पर भेजिए, प्यारा लाल गुलाब।
सीमा से बाहर नहीं, जाओ आप जनाब।।

प्रेम दिवस पर दीजिए, नव नूतन आयाम।
दुनिया जाये भाड़ में, आप करो निज काम।।
******
विविध
******
मन में यदि संशय जगे, करें नहीं वो काम।
अच्छा होगा मानिए, तव करना विश्राम।।

अहित किसी का हो रहा, करें नहीं वो काम।
कितना भी हो मिल रहा, चाहे जितना दाम।।

अनुपम ये शिवरात्रि है, अद्भुत बना सुयोग।
जन मन का विश्वास है, होंगे सभी निरोग।।

आज अनोखा दिख रहा, रिश्तों का संसार।
मुश्किल होता खोजना, पहले वाला प्यार।।

अब अपूर्व दुनिया कहे, केवल हिन्दुस्तान।
नित-नित इसका ही बढ़े, सकल विश्व सम्मान।।

अतुल शक्ति के दंभ में, डरा रहे कुछ देश।
जाने कैसी सोच है, गढ़ते नव परिवेश।।

अगर न धन हो पास तो, नहीं मिलेगा भाव।
निश्चित मानो टीसता, इसका गहरा घाव।।

अगर न धन हो पास तो, होना नहीं अधीर।
आज नहीं तो कल कृपा, होगी ही रघुबीर।।

कलयुग के इस दौर में, नाहक है सब आस।
यही आज का सत्य है, अगर न धन हो पास।।

झूठे आश्वासन मिलें, अगर न धन हो पास।
और अंत में मानिए, होना पड़े उदास।।

कठिन परीक्षा के लिए, सदा रहो तैयार।
जाने कब हो सामने, मुश्किल दौर अपार।।

जीवन के हर दौर में, आता है वो काल।
जब इठलाए शीश पर, नई परीक्षा भाल।।

मन में पावनता भरे, रखें श्रेष्ठतम भाव।
सावधान रहना सदा, मित्र मृत्यु सद्भाव।।

नाहक रखते क्यों भला, कलुषित कटुता चाह।
सावधान रहकर चलो, कठिन नहीं है राह।।

सावधान होकर चलो, नियम पालना संग।
लापरवाही घोलती, सदा रंग में भंग।।

आग लगाकर क्या भला, पा जाते हैं आप।
पता नहीं क्या आपको, करते कितना पाप।।

लगती रहनी चाहिए, यहाँ -वहाँ ही आग।
सुखरस जी भर लीजिए, और जाइए भाग।।

भीतर जलती आग है, बाहर मधुरिम राग।
कौन समझता दर्द के, कितने अलग विभाग।।

प्रतिभा का तो हो रहा, निशिदिन ही सम्मान।
कौन भला है कर सका, जिनका हो एहसान।।

नहीं दिखाती है कभी, प्रतिभा अपना दंभ।
ख्वाहिश रखती एक हो, हो नूतन आरंभ।।

कौन सहारा दे भला, बाँह थामकर आज।
सब अपने हित मगन हैं, यही मात्र है काज।।

आहें भरने से भला, कितना है सुख बोध।
कब सोचा है आपने, यह भी है अवरोध।।

कठिन समय अब आ रहा, चलें गाँव की ओर।
जिससे कल की हो सके, नूतन अपनी भोर।।

धब्बा ऐसा लग गया, नहीं रहा अब छूट।
कोशिश हमने बहुत की, भँडा गया ही फूट।।

डिब्बा अब पहचान है, देती बड़ा सुकून।
नित्य रोग फैला रही, नित्य लगाये चून।।

आज कठिन इस दौर में, पल दो पल का साथ।
शंका मन में है घुसी, पकड़ूँ किसका हाथ।।

पर दो पल का साथ भी, देता गहरा घाव।
बिना स्वार्थ के इन दिनों, कहाँ कौन दे भाव।।

बड़ा अनूठा जन्म से, विरलों का व्यक्तित्व।
खोज रहे हैं हम सभी, क्यों इसका औचित्य।।

गाँव भूल हम फँस गए, यहां बहुत है शोर।
समय हमारे पास है, चलें गाँव की ओर।।

सुधीर श्रीवास्त

Hindi Poem by Sudhir Srivastava : 112016698
New bites

The best sellers write on Matrubharti, do you?

Start Writing Now