Hindi Quote in Poem by Pawan Kumar Sharma

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हमारी चाय

ऊँचे ढलानों से उतरकर

जुबान पर चढ़ी चाय,

कि उतरने का नाम ही नहीं लेती—

कभी नुक्कड़ पर, कभी झूले की छाँव में,

कभी तंग गलियों में, कभी हाइवे की धूल में,

रंग इसके बदले बदले,

पर ढंग वही—

होठों से लगते ही

ज़िंदगी की रफ्तार थम जाती है।

कभी बहाना बनती है मिलने का,

कभी साथ देने का सलीका,

कभी बातों की शुरुआत,

कभी एक गहरी आह का कारण—

ऐसा चस्का है चाय का

कि आदत नहीं, ये रिवाज़ बन जाती है।

किसी के सिर पर भारी,

किसी को इसकी यारी,

कोई इसे अमृत पुकारे,

कोई इसे प्रीतम पुकारे—

हर मिज़ाज में

अपनी जगह बना लेती है चाय।

किसी की रोटी इससे चलती है,

कोई इसमें रोटी भिगोकर खा लेता है,

कभी ये इज्ज़त बढ़ा देती है,

कभी इज्ज़त घटा देती है—

पर फिर भी

हर चौखट पर जगह पा जाती है,

ऐसा जलवा है चाय का।

चाय बस पेय नहीं है,

ये तो

थके दिन का सुकून,

अनकही बातों की साथी,

और ज़िंदगी के हर मोड़ पर

एक गर्म सा ठहराव है।

Hindi Poem by Pawan Kumar Sharma : 112016673
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