Hindi Quote in Quotes by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH)

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ऋगुवेद सूक्ति-- (१५) की व्याख्या
तवेद्धि सख्यम् स्तृतम्।
१/१५/५
भावार्थ -प्रभो ! आपकी ही मैत्री सच्ची है।
पद-विश्लेषण--
तव = तेरा / आपका
एव इद्धि (एव इद्धि/एव हि) = निश्चय ही, वास्तव में
सख्यम् = मित्रता, मैत्री, सखा-भाव
स्तृतम् (स्तृत) = विस्तृत, फैलाया हुआ, स्थापित
भावार्थ--
“निश्चय ही आपकी (हे प्रभु!) मैत्री ही सर्वत्र स्थापित और शेष रहने वाली है।”इसे सरल शब्दों में —
“हे प्रभु! अंततः आपकी ही मैत्री स्थिर और शाश्वत है।”
यह भाव इस सत्य को व्यक्त करता है कि संसार की अन्य मित्रताएँ क्षणभंगुर हो सकती हैं, परन्तु ईश्वर का सखा-भाव अखंड और अटल है।
गीता से साम्य--
श्रीमद्भगवद्गीता (9.18) में भगवान कहते हैं—
“सुहृदं सर्वभूतानां…”
अर्थात् मैं समस्त प्राणियों का हितैषी मित्र हूँ।
इसी प्रकार (9.22) में भगवान कहते हैं--
“योगक्षेमं वहाम्यहम्”
भावार्थ — जो भक्त अनन्य भाव से मेरा स्मरण करता है, उसके कल्याण का भार मैं स्वयं लेता हूँ।
उपनिषद से साम्य--
श्वेताश्वतर उपनिषद (6.23) —
“यस्य देवे परा भक्तिः…”
भावार्थ — जिस साधक की ईश्वर में परम भक्ति है, उसके लिए दिव्य ज्ञान प्रकट होता है।
यहाँ भी ईश्वर-सखा की निकटता का संकेत है।
पुराणों से उदाहरण--
श्रीमद्भागवत महापुराण में ध्रुव और प्रह्लाद की कथा स्पष्ट करती है कि जब सबने साथ छोड़ा, तब प्रभु की ही मैत्री शेष रही और वही रक्षक बनी।
"तवेद्धि सख्यम् स्तृतम्” का गूढ़ संदेश भी यही है कि
संसार की मित्रता परिवर्तनशील है, परन्तु परमात्मा की मैत्री अनन्त और सर्वव्यापी है।
भक्त के लिए अंतिम आश्रय केवल ईश्वर-सखा ही है।श्रीमद्भगवद्गीता से प्रमाण
(1) अध्याय 9, श्लोक 18
“गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्…”
अर्थ — भगवान ही गति, पालनकर्ता, शरण और सुहृद (सच्चे मित्र) हैं।
यहाँ स्पष्ट कहा गया कि परमात्मा ही वास्तविक सुहृद (हितकारी मित्र) हैं।
(2) अध्याय 5, श्लोक 29
“भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥”
भावार्थ — जो मुझे समस्त प्राणियों का सुहृद (मित्र) जानता है, वह शान्ति को प्राप्त होता है।
यह सीधे “प्रभु की ही सच्ची मैत्री” को सिद्ध करता है।
(3) अध्याय 9, श्लोक 22
“अनन्याश्चिन्तयन्तो मां… योगक्षेमं वहाम्यहम्।”
भावार्थ — जो अनन्य भाव से मेरा स्मरण करते हैं, उनके योग-क्षेम का वहन मैं स्वयं करता हूँ।
सच्चा मित्र वही जो रक्षा और पालन करे।
उपनिषदों से प्रमाण--
(१) श्वेताश्वतर उपनिषद (4.6–7)
“द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया…”
भावार्थ — एक ही वृक्ष पर दो सुंदर पक्षी (जीव और परमात्मा) सखा (मित्र) रूप से साथ स्थित हैं।
यहाँ परमात्मा को जीव का अनादि-सखा कहा गया है।
(२) कठोपनिषद् (2.2.13)
“नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्…”
भावार्थ — वह परमात्मा सभी नित्यों में नित्य और चेतनों में चेतन है, जो सबका पालन करता है।
यही शाश्वत आश्रय और सखा है।
(३) मुण्डकोपनिषद् (3.1.1)
पुनः “द्वा सुपर्णा…” मन्त्र द्वारा परमात्मा को जीव का सहचर-सखा कहा गया है।
निष्कर्ष--
गीता और उपनिषद दोनों यह सिद्ध करते हैं कि —
परमात्मा ही “सुहृदं सर्वभूतानाम्” हैं।
जीव और ईश्वर का संबंध “सखा” के रूप में अनादि है।
संसारिक मैत्री क्षणिक है, परन्तु ईश्वर की मैत्री शाश्वत और अखंड है।
अतः “तवेद्धि सख्यम् स्तृतम्” का भाव वेदान्त से पूर्णतः समर्थित है
हे प्रभु! आपकी ही मैत्री सर्वत्र व्याप्त और अविनाशी है।
अन्य उपनिषदों से प्रमाण --
(४) बृहदारण्यक उपनिषद् (4.3.21)
“एष त आत्मा सर्वान्तरः…”
भावार्थ — यह आत्मा (परमात्मा) सबके भीतर स्थित है।
जो सर्वान्तर्यामी है, वही सच्चा निकटतम सखा है; बाह्य मित्र दूर हो सकता है, पर अन्तर्यामी नहीं।
(५) छान्दोग्य उपनिषद् (6.8.7)
“तत्त्वमसि श्वेतकेतो।”
भावार्थ — हे श्वेतकेतु! तू वही (ब्रह्म) है।
जीव और ब्रह्म का अभिन्न संबंध बताकर यह दर्शाता है कि परमात्मा से बढ़कर कोई आत्मीय नहीं।
(६) तैत्तिरीयोपनिषद् (2.7)
“रसो वै सः। रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति।”
भावार्थ — वह (ब्रह्म) ही आनन्दस्वरूप है; उसी को प्राप्त कर जीव आनन्दित होता है।
सच्चा मित्र वही जो परम आनन्द दे — यह गुण केवल परमात्मा में है।
(७) ईशोपनिषद् (मन्त्र 6–7)
“यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद्विजानतः…”
भावार्थ — ज्ञानी के लिए सब प्राणी आत्मस्वरूप हो जाते हैं।
जब सबमें एक ही परमात्मा है, तो वही सर्वव्यापी सखा है।
(८) मैत्रायणी उपनिषद् (6.17)
“एको देवः सर्वभूतेषु गूढः…”
भावार्थ — एक ही देव सब प्राणियों में गुह्य रूप से स्थित है।
वही अन्तर्यामी, वही शाश्वत सहचर।
इन उपनिषदों का समवेत संदेश यह है कि—
परमात्मा सर्वान्तर्यामी है।
जीव का उससे संबंध अभिन्न और नित्य है।
वही आनन्दस्वरूप और सच्चा हितैषी है।
अतः “तवेद्धि सख्यम् स्तृतम्” का वेदान्तीय समर्थन स्पष्ट है —
हे प्रभु! आपकी ही मैत्री सर्वव्याप्त, अन्तर्यामी और सच्ची है।
पुराणों से प्रमाण--
(१) श्रीमद्भागवत महापुराण
(क) ध्रुव चरित्र (चतुर्थ स्कन्ध)
जब ध्रुव को पिता और सौतेली माता से तिरस्कार मिला, तब उन्होंने परमात्मा की शरण ली। भगवान प्रकट होकर उन्हें ध्रुवपद दिया।
संदेश — जब सांसारिक संबंध छूट जाते हैं, तब प्रभु की ही मैत्री शेष रहती है।
(ख) प्रह्लाद चरित्र (सप्तम स्कन्ध)
हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को अनेक कष्ट दिए, पर भगवान नृसिंह ने प्रकट होकर रक्षा की।
“नैवोद्विजे पर दुर्व्यसनादसाधो…” (7.9.43)
प्रह्लाद कहते हैं — मुझे किसी भय की चिन्ता नहीं, क्योंकि आप मेरे रक्षक हैं।
परमात्मा ही नित्य सखा और रक्षक हैं।
(२) विष्णु पुराण (1.19)
“नारायणः परोऽव्यक्तात्…”
वह नारायण सबके कारण और आश्रय हैं।
जो समस्त जगत का आश्रय है, वही शाश्वत मित्र है।
(३) शिव पुराण
मार्कण्डेय ऋषि की कथा में जब यमराज प्राण लेने आए, तब भगवान शिव ने प्रकट होकर अपने भक्त की रक्षा की।
संदेश — देवाधिदेव शिव अपने भक्त के सच्चे सखा बनकर मृत्यु से भी रक्षा करते हैं।
(४) पद्म पुराण
“सर्वदा सर्वभावेन भजनीयः जनार्दनः।”
भावार्थ — जनार्दन (भगवान) का सर्वदा सर्वभाव से भजन करना चाहिए।
क्योंकि वही परम हितैषी और अनन्त सखा हैं।
निष्कर्ष--
पुराणों का समवेत संदेश यह है —
भक्त का अन्तिम और अटल आश्रय केवल भगवान हैं।
सांसारिक मित्रता परिवर्तनशील है, पर ईश्वर की मैत्री नित्य है।
संकट में वही रक्षा करते हैं और कल्याण करते हैं।
अतः “तवेद्धि सख्यम् स्तृतम्” का भाव पुराण-साहित्य से पूर्णतः समर्थित है —
हे प्रभु! आपकी ही मैत्री सर्वत्र व्याप्त और शाश्वत है।
महाभारत से प्रमाण--
(1) उद्योगपर्व — श्रीकृष्ण की पाण्डवों के प्रति सख्यता
श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं कि पाण्डव उनके अत्यन्त प्रिय हैं और वे उनके हित के लिए सदा तत्पर हैं।
यहाँ भगवान का सखा-भाव स्पष्ट है — वे केवल उपदेशक नहीं, बल्कि संकट में साथ खड़े होने वाले मित्र हैं।
(2) भीष्मपर्व (गीता प्रसंग)
अर्जुन के विषाद में श्रीकृष्ण ने सारथि बनकर मार्गदर्शन दिया।
यह केवल ईश्वर का उपदेश नहीं, बल्कि सच्चे मित्र का कर्तव्य है —
सखा बनकर रक्षा और मार्गदर्शन करना।
(3) वनपर्व — द्रौपदी की रक्षा
द्यूतसभा में जब सब मौन रहे, तब द्रौपदी ने कृष्ण को पुकारा।
भगवान ने उसकी लाज की रक्षा की।
संदेश — जब सांसारिक मित्र साथ छोड़ दें, तब प्रभु की मैत्री ही शेष रहती है।
(4) शान्तिपर्व
“न मे भक्तः प्रणश्यति” (यह भाव महाभारत में भी प्रतिपादित है)
भावार्थ — भगवान अपने भक्त का कभी नाश नहीं होने देते।
यही शाश्वत सखा का लक्षण है।
(5) नारायणीयोपाख्यान (शान्तिपर्व)
यहाँ भगवान नारायण को सब प्राणियों का परम आश्रय और हितैषी बताया गया है।
परमात्मा ही अन्तिम शरण और नित्य मित्र हैं।
महाभारत का संदेश स्पष्ट है—
श्रीकृष्ण ने पाण्डवों के साथ सखा रूप में व्यवहार किया।
संकट में रक्षा, मार्गदर्शन और आश्रय दिया।
सांसारिक संबंध टूट सकते हैं, पर ईश्वर की मैत्री अटूट है।
अतः “तवेद्धि सख्यम् स्तृतम्” का भाव महाभारत से पूर्णतः समर्थित है —
हे प्रभु! आपकी ही मैत्री अंततः स्थिर और शाश्वत है।
हितोपदेश(मित्रलाभ) --
“आपत्सु मित्रं ज्ञायते।”
भावार्थ — विपत्ति में ही सच्चे मित्र की पहचान होती है।
इस सिद्धान्त से स्पष्ट है कि जो हर परिस्थिति में साथ दे, वही सखा है। भक्त के लिए यह गुण परमात्मा में पूर्णतः विद्यमान है।
चाणक्य नीति--
“त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।”
(नीति का व्यापक सिद्धान्त — उच्चतर हित के लिए निम्न का त्याग) तथा —
“आपदि मित्रं जानीयात्।”
चाणक्य स्पष्ट करते हैं कि संकट में जो साथ दे वही सच्चा मित्र है। संसारिक मित्र सीमित होते हैं, पर ईश्वर का आश्रय सर्वकालिक है।
नीतिशतकम् — भर्तृहरि
“सज्जनाः परहितनिरता भवन्ति।”
भावार्थ — सज्जन सदा दूसरों के हित में लगे रहते हैं।
तथा एक अन्य नीति-वाक्य —
“दुर्जनः परिहर्तव्यः…”
भर्तृहरि का तात्पर्य है कि सच्चा मित्र वही है जो निष्कपट हित करे। परमात्मा “परहितनिरत” का सर्वोच्च आदर्श हैं।
इन नीति-ग्रन्थों का संयुक्त संदेश है कि सच्चा मित्र संकट में पहचाना जाता है।
जो निष्काम होकर हित करे वही सखा है।
जो सर्वदा, सर्वत्र रक्षा और कल्याण करे वही परम मित्र है।
अतः नीति-शास्त्रों की कसौटी पर भी “तवेद्धि सख्यम् स्तृतम्” का भाव सिद्ध है —
हे प्रभु! आपकी ही मैत्री पूर्ण, निष्काम और शाश्वत है।
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Hindi Quotes by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH) : 112016262
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