*ॐ नमः शिवाय।*
*"चित्तमेव हि संसारः तत्तत्त्वं चित्तनिश्चयः।*
*तस्माच्चित्तं समादाय यत्नेनैव प्रशाम्यति।।"*
यह संसार वास्तव में मन (चित्त) से ही बनता है। जैसा मन का निश्चय होता है, वैसा ही संसार दिखाई देता है। इसलिए मन को समझकर और प्रयास-पूर्वक शान्त करना चाहिए।
जब भी नई परिस्थितियां सामने आए — भले ही वो आपको पसंद न हो— उसे स्वीकार करें। आपमें जितना कम प्रतिरोध होगा, आप उतने ही अधिक कुशल और प्रभावशाली होंगे।
*आपका अपना*
*आचार्य दीपक सिक्का*
*संस्थापक ग्रह चाल कंसल्टेंसी*