॥ अकेले योद्धा का संकल्प ॥
एक ही संभालता संस्कार को,
एक ही बचाया करता धर्म को।
बाकी सब तो मोह की नींद में,
गहरी चादर तान सोया करते।
जब-जब उठीं उंगलियाँ रक्षक की नीयत पर,
जब-जब लगे लांछन पवित्र सी सीरत पर।
दुनिया की भीड़ बस शोर मचाया करती है,
बस उसके बारे में यही सब कहा करते।
कहते— "कब्जा लिया मंदिर है क्या?"
कैसी विडंबना, कैसा ये झमेला है।
जो बचा रहा है नींव को ढहने से हर पल,
वो अपनी ही दुनिया में आज कतई अकेला है।
क्या भूल है उसकी जो बचा रहा हर धूल है?
जो कांटों के बीच खिला रहा आस्था का फूल है।
पर समाज तो बस तमाशा देखने का शौकीन है,
उसे रक्षक की मेहनत भी लगती कतई फिजूल है।
वो मंदिर को ईंट नहीं, सम्मान मानता है,
वो हर गिरते पत्थर का दर्द पहचानता है।
बाकी सब तो बस अपनी ढपली बजाया करते,
पर वो अकेला ही धर्म की लाज बचाना जानता है।