किताबों के गणित से ज्यादा मुश्किल होता मन के गणित को हल करना,, अनेक पन्ने भरते भरते उत्तर गलत ही निकाल देती क्योंकि गणित में कमजोर नहीं क्योंकि उत्तर मेरे पक्ष में कभी होगा ही नहीं,, इसलिए मन के भूगोल के पीछे भाग रही और इतनी अपरिपक्व हो जाती घूम के वहीं आ जाती और अपने संवेदनाओं के व्याकरण को और कठिन बना देना चाहती और जब भी बेहतर होती, मेरे व्यक्तित्व का दर्शन आके मुझे झकझोर देता और मैं फिर शून्य में जाके बस मुस्कुरा देती.....