लाइफ की करप्ट विंडो
मेरे मदरबोर्ड (ईश्वर) ने जब, ये पुर्जा नया बनाया,
ठोक-बजाकर हार्ड डिस्क (आत्मा) का, एक पीस लगाया।
सन् दो हजार छह की वो, 'विंडो एक्स पी' वाली रात थी,
नया सिस्टम, नया जोश, और खुशियों की शुरुआत थी।
सीडी-रोम (मम्मी-पापा) ने इसमें, संस्कार का सॉफ्टवेयर भरा,
एंटीवायरस बनकर गुरु आए, ताकि सिस्टम रहे खरा।
पर हाय रे किस्मत! कुछ गलत दोस्तों के 'वायरस' आ गए,
कुछ गर्लफ्रेंड के 'मैलवेयर', मेरा सारा रैम (RAM) खा गए।
इंटरनेट से फाइल अटैच हुई, जिसे शादी कहते हैं,
अपडेट हुआ एंटीवायरस (नौकरी), अब हम ऑफिस में रहते हैं।
कॉपी-पेस्ट के चक्कर में, एक नई फाइल (बच्चा) डाउनलोड हुई,
खुशियाँ तो बहुत मिलीं, पर मेमोरी थोड़ी ओवरलोड हुई।
अब महँगाई की डायन ने, फाइलें ऐसी करप्ट कीं,
सिस्टम होने लगा हैंग, और विंडो ही इरप्ट (Erupt) की।
अब दुनिया जब भी पूछती है— "आशीष भाई, क्या हाल है?"
तो मेरा सॉफ्टवेयर बस एक ही, एरर कोड (Error Code) उगलता है:
"माफ़ करना भाई, 'योर पासवर्ड इज़ इनकरेक्ट',मेरा दिल अब हैग है, और दिमाग डिसकनेक्ट!"