कविता: दरिया का फासला
नदी के उस किनारे पर, वो बनकर आस बैठी है,
दबाकर दिल में अरमानों की, मीठी प्यास बैठी है।
इधर हम हैं कि सूनी रेत पर, चुपचाप बैठे हैं,
लगाकर ज़ख्म लहरों का, कोई इतिहास बैठे हैं।
हमारी कश्ती तो उस पार, जाने से ही रूठ गई,मझधार में ही किस्मत की, वो डोरी टूट गई।जो लेकर जाती उस साहिल पे, वो कश्ती ही डूब चुकी,मिलन की हर हसीं ख़्वाहिश, दरिया में ही ऊब चुकी।
न आवाज़ वहाँ पहुँचे, न कोई राह दिखती है,
तड़प ये फासले वाली, न कागज़ पर लिखी जाती है।
वो सुध-बुध खोके बैठी है, हम आहें भरके बैठे हैं,
दबे अरमान सीने में, कई पत्थर से बैठे हैं।
कैसे हो बात अब उनसे, कि दरिया बीच में गहरा,लगा है बेबसी का आज, यादों पर कड़ा पहरा।वो बस एक अक्स जैसी है, जो लहरों पर चमकती है,मगर छूने को बढ़ते हैं, तो ये दुनिया धमकती है।
नदी बहती ही जाती है, जुदाई को जताने को,
कोई 'आशीष' तो दे दे, इस टूटे आशियाने को।
वो उस तट पर, हम इस तट पर, बस निहारा करते हैं,
बिना पतवार के हम, उम्र सारा गुजारा करते हैं।
Adv.आशीष जैन
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