Hindi Quote in Poem by Ashish jain

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गज़ल: आँखों की ज़ुबान

हृदय में प्रेम जागा था... मगर इज़हार से डरते,
तुम्हें भी प्यार था हमसे... मगर इकरार से डरते।
अजब ये कशमकश थी... हम बस आँखों से बात करते रहे,
ठंडी आहें भरते रहे... मिलने का इंतज़ार करते रहे।

कभी हम चुप रहे... कभी तुम चुप रहे, ख़ामोशी बोलती रही,
नज़र से दिल की जो बातें थीं... वो हर पल होती रहीं।
मगर जब बात लबों तक आई... तो हम संसार से डरते,
तुम्हें भी प्यार था हमसे... मगर इज़हार से डरते।

अजब सी प्यास थी आँखों में... अजब सा एक साया था,
कि जैसे रूह ने मेरी... तुम्हें अपना बनाया था।
मगर खोने के डर से हम... खुद अपनी पुकार से डरते,
हृदय में प्रेम जागा था... मगर इकरार से डरते।

तड़प दिल की ये 'आशीष'... आँखों ही आँखों में पलती रही,
मोहब्बत की ये शमा... बस धड़कनों में जलती रही।
ग़ज़ल बन कर जो छलका दर्द... तो हम झंकार से डरते,
हृदय में प्रेम जागा था... मगर इज़हार से डरते।

adv.आशीष जैन
7055301422

Hindi Poem by Ashish jain : 112014352
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