Hindi Quote in Poem by Ashish jain

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कलम का स्वाभिमान

दंभ के महलों में बैठकर, वो खुद को खुदा समझते हैं,
मातृभाषा की आड़ में, वो हिंदी को 'गदा' समझते हैं।
नफरत की इस राजनीति ने, साहित्य का आँगन मैला किया,
जोड़ने वाली विधा को, भाषाई जंग का अखाड़ा किया।

वो समझते हैं हम भिखारी हैं, शब्दों की भीख मांगते हैं,
शायद भूल गए वो 'दिनकर' को, जो सोए शेर जगाते हैं।
हमारी खामोशी को हमारी, मजबूरी मान बैठे वो,
हिंदी के विशाल सागर को, एक छोटी क्यारी मान बैठे वो।

तुम करो नौटंकी अपनी, हम अपनी साख बचाएंगे,
तुम नफरत की भाषा लिखो, हम प्रेम का राग सुनाएंगे।
इतिहास गवाह है वक्त का, हर घमंड एक दिन टूटता है,
कलम जब सच लिखती है, तो सिंहासन भी छूटता है।

भिखारी वो नहीं जिसके पास 'व्यूज' की कमी है,
भिखारी वो है जिसकी सोच में, संस्कारों की कमी है।
रचना की उम्र लंबी है, ये शोर तो बस दो दिन का है,
साहित्य वही अमर हुआ, जो हर भाषा में जन-जन का है।
adv. आशीष जैन
7055301422

Hindi Poem by Ashish jain : 112014329
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