Hindi Quote in Poem by Ashish jain

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मुखौटों का शहर

पॉश गली की कोठियों में, ऊँचे-ऊँचे द्वार थे,
बाहर दरिंदे घूम रहे, भीतर सब 'संस्कार' थे।
चीख गूँजी रात में, पर बंद खिड़की-कान थे,
इंसानियत चुप थी खड़ी, पत्थर हुए इंसान थे।

कोई न आया बचाने को, बस एक बेजुबान लड़ा,
हौसला उस जीव का, उन कायरों से था बड़ा।
नोचते थे वे बदन, वह क्रोध में चिल्ला रहा,
चीख को सुन-सुन के वह, बस रोना अपना पा रहा।

भौर होते ही अचानक, जाग उठीं संवेदनाएं,
हाथ में कैंडल लिए, अब दे रहे सब दुआएं।
कैमरों के सामने, कुछ अश्क भी छलका दिए,
पाप जो कल रात थे, वे मोम से झलका दिए।

वही गवाह 'अशुभ' है, जो सत्य पर है भौंकता,
पाखंड की इस भीड़ को, जो आईना है सौंपता।
'मनहूस' कहकर उस वफ़ा को, दूर सबने कर दिया,
झूठ की चादर तले, फिर सच को उसने भर दिया।

धिक्कार है उस सभ्यता पर, जहाँ रक्षक मौन है,
खुद से पूछो ऐ मनुज, अब जानवर यहाँ कौन है?
मोमबत्ती मत जलाओ, गर लहू ठंडा पड़ा,
इंसान से तो आज वह, 'मनहूस' कुत्ता ही बड़ा।

Adv. आशीष जैन
705301425

Hindi Poem by Ashish jain : 112014272
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