उम्मीद का दीया
चहुँ ओर अंधेरा गहरा है, अन्याय का सख्त पहरा है, न्याय की चौखट धूल भरी, और सच का चेहरा उतरा है। माना कि रक्षक सोए हैं, ईमान कहीं हम खोए हैं, पर अंतर्मन की गहराई में, विश्वास के अंकुर बोए हैं।
कलम बिकी, कानून बिका, इंसानियत का जून बिका, मंदिर की सीढ़ी पर बैठ यहाँ, आस्था का पावन खून बिका। सन्यासी की झोली खाली नहीं, ये त्याग वाली दिवाली नहीं, पर फिर भी मन ये कहता है, कि रात अभी मतवाली नहीं।
उठेंगे पैर, रुकेंगे नहीं, हम जुल्म के आगे झुकेंगे नहीं, जब तक न आए वो भोर नई, हम हक की राह तजेंगे नहीं। वो 'राम राज्य' फिर आएगा, हर मन पावन हो जाएगा, इसी भरोसे की लौ को, ये 'आशीष' सदा जलाएगा।
Adv. आशीष जैन
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