जिन्दगी इतनी ही नहीं
और अधिक थी,
प्यास इतनी ही नहीं
और अधिक थी।
आसमान इतना ही नहीं
और अधिक था,
दुख इतना ही नहीं
और बिखरा था,
सुख इतना ही नहीं
और जुड़ा था।
ममता इतनी ही नहीं
और फैली थी,
प्यार इतना ही नहीं
और बाकी था।
धरती इतनी ही नहीं
और जीवट थी,
जीवन इतना ही नहीं
और शेष था।
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*** महेश रौतेला