मैं अब भी खड़ी हूँ
मैं अब भी खड़ी हूँ,
टूटी नहीं हूँ, हारी नहीं हूँ,
हालाँकि ज़िंदगी ने हर मोड़ पर
मुझसे मेरी परीक्षा ली है।
कभी अपनों ने सवाल उठाए,
कभी हालातों ने आईना दिखाया,
कभी सपनों को बोझ कहा गया,
तो कभी मेरे मौन को मेरी कमज़ोरी समझा गया।
मैंने सीखा है
ख़ामोशी में खुद से बातें करना,
आँसुओं को तकिये में छुपाना,
और सुबह उठकर फिर से
मुस्कान पहन लेना।
हर दिन आसान नहीं था,
कई रातें बिना जवाब के गुज़रीं,
कई दुआएँ अधूरी रहीं,
और कई उम्मीदें
खुद से ही टूटकर बिखर गईं।
पर मैंने हार मानना नहीं सीखा,
क्योंकि गिरने से ज़्यादा डर
मुझे रुक जाने से लगता था।
मैं जानती थी,
अगर मैं थम गई
तो मेरी कहानी वहीं खत्म हो जाएगी।
लोग कहते हैं,
“सब्र रखो, वक्त बदल जाएगा”,
पर कोई नहीं बताता
कि सब्र के उस वक्त में
दिल कितनी बार टूटता है।
फिर भी,
मैंने हर टूटे हिस्से को
खुद से जोड़ना सीखा।
मैंने देखा है
सपनों को मज़ाक बनते हुए,
मेहनत को अनदेखा होते हुए,
और सच्चाई को
अक्सर अकेला पड़ते हुए।
फिर भी,
मैंने सच का हाथ नहीं छोड़ा।
क्योंकि मुझे भरोसा था
कि देर भले हो,
पर अंधेरा हमेशा नहीं रहता।
हर रात के बाद
एक सुबह ज़रूर आती है,
जो नई रोशनी लेकर आती है।
मैं अब भी खड़ी हूँ,
थोड़ी थकी हुई,
पर पूरी तरह टूटी नहीं।
मेरी आँखों में अब भी
कल का सपना बसता है,
और मेरे कदमों में
आगे बढ़ने की ज़िद।
मैं जानती हूँ,
मेरी जीत शोर नहीं मचाएगी,
वो चुपचाप आएगी,
मेरी मेहनत के साथ,
मेरे धैर्य के साथ,
और मेरे विश्वास के साथ।
और जब मैं पीछे मुड़कर देखूँगी,
तो मुझे गर्व होगा
कि हालातों ने बहुत कोशिश की,
मगर मुझे हरा नहीं पाए।
क्योंकि मैं गिरकर भी उठी,
रोकर भी चली,
और टूटकर भी
खुद को बचा लाई।
मैं अब भी खड़ी हूँ,
और यही मेरी सबसे बड़ी जीत है।