"हर ख़ुशी उधार सी"
हर ख़ुशी उधार-सी, हर ग़म हमारा हो गया,
हर लफ़्ज़ आईना, हर रिश्ता किनारा हो गया।
तमाम उम्र गुज़र गई गिरहें सुलझाने में,
मगर ज़िंदगी की भीड़ में फिर भी गुज़ारा हो गया।
न किसी से तवज्जो की चाह, न शफ़कत की तलब,
ख़ल्वतों को ओढ़ लेना अब गवारा हो गया।
आँखों की ख़ामोशी भी अब सवाल लिखने लगी,
हर बहता अश्क़ मानो टूटा सितारा हो गया।
हर बात लबों तक लाना मुमकिन नहीं “कीर्ति”,
अब ग़ज़लें ही दिल के ज़ख़्मों का सहारा हो गया।
Kirti Kashyap"एक शायरा"✍️