उधार ली गई भाषा
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बरसों बाद तुम्हें देखा
तो खिल गया—
जैसे मुस्कुराने को खिलते हैं दो होंठ।
और इसी क्रम में चुपके से,
दबे पाँव कविता अपनी देह जमा गई।
शब्द कुछ नहीं थे,
व्याकरण कुछ नहीं था,
पर फिर भी एक लय
मेरे तालु पर आ गिरी ।
ठीक उसी प्रकार
जिस तरह सर्दियों में
ओस की बूँदें पत्तों पर टपकती हैं।
इसे लोगों ने कहा—प्रेम,
कवियों ने कहा—कविता,
दार्शनिक ने कहा— संवाद,
और जो कुछ न कह पाया,
कविता उसी की हो गई।
और इस तरह,
तुम्हें देखते हुए
मैंने
पहली बार जाना कि
कविता लिखना
दरअसल स्त्री-मन से
उधार ली गई भाषा है।
@कुनु