English Quote in Motivational by Aachaarya Deepak Sikka

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*ॐ नमः शिवाय*

*गौ,तुलसी,और पीपल की प्रदक्षिणा करने से, तीर्थयात्रा का फल प्राप्त होता है।*
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*पद्मपुराण के,स्वर्गखण्ड के,40 वें अध्याय के,9 वें श्लोक में,नारद जी ने, धर्मराज युधिष्ठिर को,गौ,तुलसी तथा अश्वत्थ अर्थात पीपल के वृक्ष का माहात्म्य बताते हुए कहा कि-*

*अश्वत्थस्य तुलस्याश्च गवां कुर्यात् प्रदक्षिणाम्।*
*सर्वतीर्थं फलं प्राप्य विष्णुलोके महीयते।।*

प्रत्येक धार्मिक स्त्री पुरुषों को,अपने जीवन के कर्तव्य का ज्ञान होना चाहिए। शास्त्रों में, प्रत्येक स्त्री पुरुष के कर्तव्यों का वर्णन है।

हमको क्या करना चाहिए,यदि यही ज्ञान नहीं है तो,ऐसे अनभिज्ञ धार्मिक स्त्री पुरुष तो अपनी स्वेच्छा से,अथवा किसी अन्य अज्ञानी धार्मिक स्त्री पुरुषों की क्रिया को देखकर कुछ भी असावधानी पूर्वक करते रहेंगे,तो सत्कर्म का जैसा फल प्राप्त होना चाहिए था,जितना फल प्राप्त होना चाहिए था,तथा जितने समय में फल प्राप्त होना चाहिए था,वह फल प्राप्त नहीं होने पर,अश्रद्धा उत्पन्न हो जाती है। यदि एकबार अश्रद्धा और अविश्वास हुआ तो, धार्मिक कर्म करने की इच्छा ही समाप्त हो जाएगी।

यदि धार्मिक कार्यों को करने की इच्छा ही समाप्त हो गई तो, भविष्य में,जो भी कुछ अच्छा होनेवाला होगा,वह भी नहीं होगा।

*प्रत्येक धार्मिक श्रद्धालु, स्त्री पुरुषों को,शास्त्रों के अनुसार विधि करते हुए, धैर्यपूर्वक धर्माचरण सत्कर्म आदि करना चाहिए।*

सत्कर्म के सम्पूर्ण फल की अप्राप्ति में,सर्वप्रथम तो अज्ञान,अनभिज्ञता ही कारण है। इसके पश्चात तो अनेकों प्रकार के कारण हो सकते हैं। किन्तु मुख्य कारण तो अज्ञान ही है।

अति अल्प प्रयास और अभ्यास से, पुण्य फल की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में,जैसे जैसे व्यक्ति होते हैं,उनके लिए,वैसा वैसा ही विधान प्राप्त होता है।

यदि कोई धार्मिक स्त्री पुरुष, तीर्थयात्रा करने में शारीरिक बल से क्षीण हैं। या शारीरिक रोग के कारण या मानसिक ताप के कारण, तीर्थयात्रा करने में असमर्थ हैं तो,उनके लिए भी, शास्त्रों में,शक्ति सामर्थ्य को देखते हुए विधान किया गया है।

*जिसके जितना बल।*
*उसको उतना फल।*
अब आइए,कल्याण के,इस सरलतम उपाय स्वरूप शास्त्रीय विधि पर विचार करते हैं।

*अश्वत्थस्य तुलस्याश्च गवां कुर्यात् प्रदक्षिणाम् ।।*
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*अश्वत्थस्य,अर्थात पीपल की,तुलस्याश्च,अर्थात तुलसी की,गवाम् अर्थात गौ की,प्रदक्षिणाम् कुर्यात् अर्थात प्रदक्षिणा अर्थात कुर्यात् अर्थात करना चाहिए।*

अब इससे अच्छा सरलतम उपाय और क्या हो सकता है! तुलसी अपने गृह में ही होती है। पीपल भी प्रायः सर्वत्र प्राप्त होता है। गौ माता भी प्रायः सर्वत्र प्राप्त होतीं हैं।

यदि इन तीनों की प्रदक्षिणा की जाए तो,उसका फल भी देख लीजिए!
*सर्वतीर्थं फलं प्राप्य विष्णुलोके महीयते।।*
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गौ,तुलसी तथा *अश्वत्थ अर्थात पीपल* की प्रदक्षिणा करनेवाले स्त्री पुरुषों को, *सर्वतीर्थम् अर्थात भारत के जितने भी तीर्थ हैं,* चारों धाम,द्वादश ज्योतिर्लिंग आदि सभी तीर्थों में दर्शन करने का जो फल होता है,गंगा आदि दिव्य नदियों में स्नान आदि करने का जो फल प्राप्त होता है,वे उनकी प्रदक्षिणा करके उन्हीं फलों को प्राप्त कर लेते हैं।

यदि कोई निर्धन,निर्बल निर्बुद्धि स्त्री पुरुष हैं,उनको मात्र इतनी ही शिक्षा दी जाए कि- गौ,तुलसी और पीपल की प्रदक्षिणा किया करो, और यदि वह इतना कार्य,सदा ही करते हैं तो,जो धनवानों को,सबलों,समर्थों को सभी तीर्थों की प्रदक्षिणा का फल प्राप्त होता है,वही फल,उन निर्धन,निर्बल निर्बुद्धि स्त्री पुरुषों को गौ,तुलसी और पीपल की प्रदक्षिणा करने मात्र से फल प्राप्त होगा।

*यदि कोई सबल,धनवान बलवान विद्वान व्यक्ति भी इनकी प्रदक्षिणा करेंगे तो,उनको भी वही सर्वतीर्थाटन करने फल प्राप्त होगा, इसमें कोई संदेह नहीं है।*

अब इस शरीर की पूर्णायु के पश्चात का फल सुनिए!

*विष्णुलोके महीयते।*
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*गौ, तुलसी और पीपल की प्रदक्षिणा कर्ताओं को,शरीर त्याग के पश्चात,विष्णुलोक अर्थात भगवान का धाम प्राप्त होगा।*
*तुलसी भी भगवान विष्णु को अतिप्रिय है। गौ माता की रक्षा के लिए तो वे अवतार लेकर ही आते हैं। अश्वत्थ अर्थात पीपल तो उनका ही स्वरूप है।*

*इसका तात्पर्य यह है कि- भगवान को प्रसन्न करने के लिए तथा अपना कल्याण करने के लिए,अतिलघु,सरलतम उपाय, शास्त्रों में, ऋषियों मुनियों ने बताए हैं। यदि कोई स्त्री पुरुष,इतना सरल उपाय करके भी,अपना कल्याण नहीं कर सकते हैं तो,वह मनुष्य ही कैसे कहा जाएगा!

English Motivational by Aachaarya Deepak Sikka : 112010562
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