“भेड़ियों के बीच”
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मुझे काट दो—
टुकड़ों में बाँट लो।
हर कोने में दुबके हैं साये,
किसकी सिसकी
कौन सुन पाए—
किसे फ़ुर्सत है अब रोने वालों की?
कभी अपने हथियारों को
थोड़ा और धारदार बना लो;
मैं कोई अँधेरा नहीं,
जिसे तुम काट न पाओ।
कोनों में दुबका
कोई भयछाया भी नहीं हूँ—
मैं तो बस
अपनी ही देह का सच लेकर
तुम्हारे सामने खड़ा हूँ।
अपनी भूख बुझा लो—
पर मेरे टुकड़ो को
अग्नि के हवाले मत करना,
फ्रिज की ठंडाई में
सुन्न भी मत बनने देना।
बोटी–बोटी कर
भेड़ियों को खिला दो—
वे कुर्सियों से चिपके भेड़िये हैं,
जिन्हें लजीज़ कुर्सियाँ पसंद हैं,
और पसंद है
ठंडा गोश्त भी।
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