Hindi Quote in Poem by Anup Gajare

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"इमरोज़ की छाया में"
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1.

तुम्हारे बिना
लाचार होकर जीने से मुझे चिढ़ है—
क्योंकि मेरे भीतर की आग
किसी प्रेमी की उँगलियों से नहीं,
मेरी अपनी राख से उठी चिंगारी है।

2.

प्यार अगर बाँध बन जाए
तो नदी घुटकर मर जाती है;
और मैं नदी हूँ—
अपना कटाव भी मेरा,
अपनी दिशा भी मेरी।

3.

तुम आए—
तो मेरे भीतर की भाषा खनक उठी,
मेरी देह का अनकहा अर्थ
कविता की तरह चमकने लगा;
पर कविता लिखने के लिए
मैं किसी की मोहताज नहीं।

4.

मैंने तुम्हें इसलिए चाहा
क्योंकि तुम मेरी आज़ादी जैसे थे,
न कि वे बेड़ियाँ
जिनमें सदियों से
औरतों की साँसें कैद की जाती रही हैं।

5.

तुम्हारे हाथों में रंग,
मेरे हाथों में अक्षर;
हमने एक-दूसरे को गढ़ा,
पर किसी को तोड़ा नहीं।

6.

दुनिया पूछती है—
क्या औरत की ज़िंदगी इमरोज़ की तलाश है?
मैं कहती हूँ—
औरत की ज़िंदगी
अपनी ही राख से उठने की कला है;
जब वह पूरा उजाला बन जाती है,
तभी कोई इमरोज़
उसमें ठहर सकता है।

7.

मेरी चिढ़ यह नहीं
कि तुम्हारे बिना मैं मर जाऊँगी—
मैं अपनी हड्डियों के साहस से चलती हूँ।
पर तुम्हारे साथ जीने की भूख
और गहरी, और तीखी हो जाती है।

8.

मैं तुम्हारी गोभी के पराँठों में नहीं थी,
न उन सपनों की भाप में
जो तवे से उठकर तुम्हें बहलाती थी।
मैं तुम्हारी भूख नहीं—
अपने भीतर की एक पूरी दुनिया हूँ,
जहाँ प्रेम भी उगता है
और अपना आकाश भी।

9.

तुम्हारे आने से
मैं खत्म नहीं हुई—
मैं दोहरी हो गई:
एक प्रेम की स्त्री,
एक अपनी ही लौ की संरक्षिका।

10.

तुम रहो तो वसंत,
न रहो तो सावन—
पर मैं ऋतुओं की मोहताज नहीं;
मेरी ऋतु मेरे भीतर जन्म लेती है।

11.

मैं तुम्हें इसलिए चाहती हूँ—
क्योंकि तुम्हारे साथ
मैं लाचार नहीं,
बल्कि और ज़्यादा
मैं हो जाती हूँ।
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Hindi Poem by Anup Gajare : 112006853
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