( किताबे और मै )
कभी सोचा है तुमने, किताबें भी रोती होंगी ?
जब कोई उन्हें बंद कर देता है बीच एक अधूरी कहानी के..
मैं और मेरी किताबें हम दोनों एक दूसरे के हमराज है..
मैं उन्हें पढ़ती हु और वो मुझे लिखती है।
हर पन्ना मेरी सांसे जानता है और हर लफ़्ज़ मेरी तन्हाई..
इन्हीं के बीच कही मेरी कहानी गुम है—जो मैने नहीं लिखी ! पर इन्होंने सम्भाल कर रखी है।
कभी कभी मैं सोचती हु, कि अगर मैं चली गई तो इन किताबों को भी दफन किया जाएगा? क्या कोई उन्हें पढ़कर महसूस करेगा कि उनमें अब भी मेरी सांसे बसी है?
मैने उनके पन्नों पर आंसू गिराए और बिना किसी शिकायत उन्होंने सब समेट लिए.....
वो मेरी रूह के टुकड़े संभाले बैठी है।
किताबें—
सिर्फ कागज और स्याही नहीं होती,
वो दिल के ज़ख्म होते है जो लिखते वक्त बहते है!
और बंद होने के बाद सुकून बन जाते है....
मैं भी एक किताब ही तो हु—
कुछ अधूरी लिखी हुई,
कुछ पढ़ने से पहले ही समझ ली गई....
और कभी कभी सोचती हु....
जब मेरी कहानी पूरी हो जाए, तो कोई मुझे बंद न करे...
खुला छोड़ दे !
ताकि मेरी रूह हवा में घूमती रहें, और पढ़ानेवाले के दिल को एक नया पन्ना बना जाए....
किताबें और मै—
एक ही दास्तां के दो पन्ने है...
मैं लिखाई हु वो याद रखती है—
और जब वक्त खामोश हो जाता है, हम दोनों एक दूसरे को पढ़ते है।
रात के सुकून में
जब दुनिया ख्वाबों में गुम होती है, मैं अपनी किताबें खोलती हु—और वो मेरे ज़ख्मों की जुबा बन जाती है!
उनके पन्नों पर लिखे हुए लफ्ज़ मेरे अंदर से गुजरता है,
जैसे कोई पुरानी याद फिर से सास लेने लगी है!
किताबें—
सिर्फ पढ़ी नहीं जाती,
वो रूह का आईना होता है—
जिनमें मै अपना हर लम्हा देखती हु!
कभी लगता है,
ये किताबें मुझे मुझसे ज्यादा जानती है,
मेरी खामोशी के रंग मेरे लफ्जों की खुशबू, सब उनके सीने में चुप जाते है!
कभी कभी वो पूछती है,
"तू दर्द लिखती है, या दर्द तुझे?"
और मैं मुस्कुरा कर कहती हु—
"मैं तो सिर्फ कलम पकड़ती हु, लिखने वाला तो अंदर बैठा है—जो लफ्जों में सास लेता है।"
सोचती हु,
जब मैं नहीं रहूंगी तो क्या इन किताबों के बीच तब भी मेरी खामोशी गूंजती रहेगी? क्या कोई उन्हें खोल कर महसूस करेगा कि इन लफ्जों के बीच एक लड़की जिंदा थी? जो लफ्जों पर अपनी सांसे लिखती थी...
मैं किताबें नहीं पढ़ती, उनमें अपने आप को ढूंढती हु,
किताबर मेरी खामोशी जानते है—और दुनिया सिर्फ मेरे लफ्ज़!
मैं हर किताब के अंदर दफन हो चुकी हु,
पर हर पन्ना अब भी सांस लेता है!
हर पन्ने पर लिखा है—मैं सिर्फ लिखती नहीं हु, लिखूं हुई भी हु!
किताबें मेरी रूह का आईना है—
उनमें जो सब लिखा है वो मै हु !!