साधन बढ़े,
पर सुख वही का वही…
पाँच लाख की गाड़ी हो या पाँच करोड़ की —
चलती वही सड़क पर,
ले जाती वही दूरी तक,
पर जेब में डर और मन में चिंता
अचानक बढ़ जाती है।
मोबाइल चाहे दस हज़ार का
या एक लाख का —
कॉल वही, बातें वही,
पर टूटने का डर
दिल में घर बना लेता है।
महँगे बिस्तर से
नींद नहीं आती,
नींद तो साधारण चटाई पर भी
लोरी बनकर उतर आती है।
बड़ा घर हो जाए
तो दीवारें बढ़ती हैं,
दिलों का मिलन नहीं।
पति करोड़ों कमाए,
स्त्री सना रहे शृंगार में —
फिर भी
आनंद का दीपक
अधूरा-सा टिमटिमाता है।
क्योंकि
कीमती चीज़ें
कीमती चिंता लेकर आती हैं —
सुख नहीं।
धन से सुविधा मिलती है,
पर शांति नहीं।
साधन शरीर को संवारता है,
पर आनंद आत्मा में खिलता है।
अगर सुख बाहर होता —
तो अमीरों के घरों में
मंदिर नहीं,
मुस्कानें विराजतीं।
सच इतना-सा है —
सुख कभी वस्तुओं में था ही नहीं,
वह तो हमेशा भीतर बैठा था।
बाहर की चीज़ें
बस थोड़ी देर
खुशी उधार देती हैं,
और ब्याज भी मन से वसूल लेती हैं।
जब सब मिल जाता है
और फिर भी कुछ कमी रह जाती है —
तभी समझ आता है:
ज़िंदगी साधनों का खेल नहीं,
साधना की उपलब्धि है।
जिनके पास धन है, पद है, प्रसिद्धि है —
दिखाई देता है कि जीवन का पूरा सुख उन्हीं के पास है,
यही जरूरतें पूरी हों तो ज़िंदगी पूरी हो गई।
पर वही लोग
सबसे ज़्यादा दुख के बोझ तले दबे होते हैं।
क्योंकि
भीतरी ऊर्जा,
भीतरी शांति,
भीतरी प्रेम —
इन सबको उन्होंने बाहर की चीज़ों से
खरीदने की कोशिश की है।
धन बढ़ा, साधन बढ़े —
पर अभाव भी बढ़ता गया।
जो तुम दुनिया के “सबसे बड़े” समझते हो —
वे ही सबसे गरीब हैं।
उनके महलों के भीतर
मौन की काली छाया रहती है।
उनके हँसी के पीछे
अकेलेपन का समुद्र उफनता रहता है।
और एक मंदिर के कोने में बैठा भिखारी —
सच में वह भगवान के ज्यादा करीब है।
क्योंकि उसके भीतर
वह बीज है,
वह ऊर्जा का भण्डार है —
जो उसे भीतर की यात्रा करवा सकता है।
अगर वह आँख बंद कर ले —
बस एक पल,
एक कदम भीतर —
तो वही भिखारी पा ले
लाखों राजाओं से अधिक सुख,
अमर शांति,
जीवन-बोध का दिव्य रस।
यह भीतर का मंथन है —
भीतर का प्रकाश है —
यह जीवन है।
यहाँ बाहरी साधनों की
ज़रूरत ही नहीं।
Vedānta 2.0 © 𝓐𝓰𝓎𝓪𝓣 𝓐𝓰𝓎𝓪𝓷𝓲 —